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Monday, February 17, 2025

गांव भरनाकलां में तालाबों की संख्या

 मेरा गांव मेरा गर्व- 

🌅तालाब/सरोवर हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। भरनाकलां गांव की चारों दिशाओं में प्रमुख ४ सरोवर हैं इसके पूर्व में श्यामकुण्ड, पश्चिम में नधा, दक्षिण में मुहारी(मुहारवन) एवं उत्तर में समोंखरी(छोटा तालाब) है । गांव के चारों तालाबों में से किसी की भी अभी बाउंड्रीवॉल द्वारा घेराबंदी नहीं हुई है। अभी सभी तालाबों की कच्ची मेड़ों के माध्यम से सीमा निर्धारित है। गांव भरनाकलां के चारों तरफ इस तरह का जलीय भराव प्राकृतिक सौंदर्य व अच्छे से जल के प्रबंध को दर्शाता है। ये सब हमारे गांव के पूर्वजों की मेहनत का नतीजा है इसलिए हम उनका और सौंदर्यीकरण कर के सरकार और ग्रामवासियों की सहायता से और ज़्यादा खूबसूरत बना सकते हैं जैसे उचित ताजा पानी भरने के लिए बोरवैल और गंदी नालियों के जल प्रवाह को रोक कर जो इन सभी तालाबों में ग्रामवासियों के घर से बहता हुआ जो गिरता है। पक्की चारदीवारी कर के उनके चारों ओर अच्छे पेड़- पौधे लगाकर साथ ही सरोवर के चारों तरफ परिक्रमा मार्ग बनाकर जिससे ग्रामवासी सुबह- टहल सकें वहां अगर बैठने का भी उचित प्रबंध हो तो सोने पे सुहागे जैसा होगा, ताकि सभी लोग इस विरासत का लाभ उठा सकें।


ग्राम के चारों सरोवर इस प्रकार से हैं - 



 १-*मुहारी कुंड*- ठाकुर बिहारी जी महाराज मन्दिर के पास स्थित तालाब को मुहारी के नाम से जाना जाता है । इसमें जल भरने की व्यवस्था भरतपुर फीडर (बम्बे) के जल से नाले द्वारा की जाती है । कुंड के किनारे दो बड़े घाट बने हुए हैं जोकि ठाकुर बिहारी जी महाराज मंदिर की तरफ हैं। कभी इसी कुंड में  सभी गांव वाले लोग अपने पशुओं को जल पिलाने यहीं लाया करते थे । कार्तिक मास में नहाने वाले भक्त एक महीने तक इसी कुण्ड में 4 बजे भोर काल में गोता लगाते थे । लेकिन अब कोई नहीं नहाता, सिर्फ 4-6 पालतू बतखों के अतिरिक्त । कुछ भक्त लोग गांव की परिक्रमा देते वक्त तालाब की मछलियों के लिए आटे की गोलियां या चावल के दाने हर रोज आया करते हैं । सरोवर के किनारे ग्रामवासियों के पूर्वज देवतारूप में जिन्हें थान बाबा (देवस्थल/पूर्वजस्थल)के नाम से पुकारा जाता है, वो बने हुए हैं । यह गांव के ढाई विसा क्षेत्र की भूमि पर स्थित है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह सबसे बड़ा (लगभग ४ एकड़)और सुंदरता की दृष्टि से सबसे सुन्दर सरोवर है।

२- श्यामकुंड- 



श्यामकुंड में पुराने घाट भी हैं जो कि शैडो मैया (ग्राम्य देवी) के मंदिर वाली दिशा में हैं जो कि बघेल समाज की बसावट के पीछे की दिशा की ओर हैं । वर्तमान में भौगोलिक स्वरूप तो श्यामकुंड का है लेकिन कागजी भूखंड न होने की वजह से विलुप्ति की कगार पर है । लेकिन सभी गांव के लोगों द्वारा स्वैच्छिक रूप से इसकी स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए ताकि इसके पुराने स्वरुपानुसार इसका विकास किया जाए। क्यूंकि इससे प्रकृति के अनुरूप इको सिस्टम बना रहता है साथ ही कही ना कही और कभी ना कभी आग लगने के समय भी इसके जल का उपयोग कर लिया जाता है। इसके अतिरिक्त गांव में जब कभी नए मकान बनवाए जाते हैं तो ग्रामवासी गारे व तड़ाई के लिए भी इस श्यामकुंड के पानी का प्रयोग करते ही हैं, पशुओं के लिए भी कभीकभार प्रयोग में ले ही लिया जाता है। यह गांव के "दश विसा क्षेत्र" में स्थित है।  यह तालाब चारों तालाबों में से इकलौता ऐसा है जिसके किनारे पर स्थित मंदिर इसकी सीमा से बाहर हो गया है। बाकी सभी तालाबों के किनारे अभी सभी मंदिर विद्यमान हैं।

३- *नधा*- गांव के छोटे मंदिर "श्री राधाकृष्ण मंदिर" के पीछे वाले तालाब को नधा के नाम से जाना जाता है। इस तालाब की एक बार सफ़ाई हुई तो इसी के माध्यम से इस सरोवर की सीमाओं का निर्धारण किया गया था। इसमें बारिश के पानी का ही संचय होता है। अलग से पानी भरने की व्यवस्थाएं नहीं हैं। ये गांव के तीनों विसे (दश विसा, सवा विसा, ढाई विसा ) में से, ढाई विसा में स्थित है।

 ४- *समोखरी* - यह तालाब गांव के उत्तरी छोर पर स्थित है यह गांव के किनारे स्कूल फॉर्म की भूमि के किनारे पर है, गांव में थोक सीमा के अनुसार दश विसे में आता है। इसकी कभी साफ़ सफ़ाई नहीं हो पाती इसलिए इसमें जलकुंभी से पटा रहता है, आकार की दृष्टि से भी यह तालाब गांव के अन्य तालाब से काफी छोटा है। तालाब के किनारे ही हनुमान जी का मंदिर भी है।

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जल ही जीवन है, जल को बचा लेना जैसे भावी जीवन को बचा लेना है। अक्सर गर्मी बढऩे के साथ ही जल की जरूरत महसूस की जाती है।  देश में तालाबों की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अधिकांश प्राचीन मन्दिर तालाबों के किनारे ही विद्यमान हैं। तालाब पर पूरे देश के अंचलों में पारंपरिक लोक गीतों का प्रचलन है। गांवों में तालाबों की अपनी गरिमा है, तभी तो इसे जलाशय, ताल तलैय्या, गहड़ी, पोखर, चेवर, आहर, हौजी हौदा, सागरा, तरिया, झील और बावड़ी के नाम से अलग-अलग प्रदेशों में जाना जाता है।

 जीवन में धर्म- कर्म और व्यवहार का वास्तविक दर्शन करना हो तो तालाब के किनारे जाकर महसूस कीजिए। नदी, तालाब एवं सागर से होकर गुजरने वाली हवायें बेहतर स्वास्थ्य के लिये आयुर्विज्ञान हैं। तालाब के किनारे पेड़ के नीचे बैठना, नदी अथवा सागर के किनारे खड़ा होना, लहरों के अठखेलियों को देखना, जलधार में उतरकर इसके आनन्द को महसूस करना तो निजी अनुभूति की बात है। समय के साथ लोग बदले इसके साथ ही लोगों के सोच में भी परिवर्तन हुये । इस परिवर्तन ने नकारात्मक बदलाव का रूप ले लिया उसी का नतीजा है कि आज तब के तालाब भी तब जैसे नहीं रहे । चूंकि तालाब हमारे सांस्कृतिक धरोहर के साधन हैं, डर है कि हमारी उदासीनता के चलते कहीं यह भी विलुप्त न हो जायें। इससे पहले कि हमारे सोच से तालाबों की बेदखली हो हमें इसके वर्तमान दशा को सुधारना होगा, तभी भविष्य में उसकी मौजूदगी का लाभ हम ले सकेगें। तालाबों के किनारे विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक क्रियाकलाप संचालित होते रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि तालाबों का अस्तित्व एक स्थल रूप में न होकर लोक मानस के जीवन का अविभाज्य अंग है। अभी 50 वर्ष पहले तक तालाब ही जल का प्रमुख स्रोत होते थे, तब तालाबों का रख-रखाव एक देवता मानकर किया जाता था। तालाबों और जलाशयों के देखरेख का काम पूरा समाज करता था। तालाब निर्माण से लेकर उसकी रक्षा में लोक अपनी जिम्मेदारी समझता था। नल, ट्यूबवेल आदि के आने से पानी के परम्परागत स्रोतों की उपेक्षा हुई। लोग वर्षाजल संग्रह का पुराना तरीका भूलते गए जिससे नए-नए तरह के खतरे हमारे सामने आने लगे। अब सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर फिर से तालाबों के महत्त्व को समझ कर उसके लिये काम शुरू हुआ है।

ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा

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