मेरा गांव मेरा गर्व-
भरनाकलां गांव में सौभरेय अहिवासी ब्राह्मणों के "उपगोत्रों/अवंटक/ अल्ल" के नाम इस प्रकार से हैं-
1-नुक़्ते(बरगला) 2- इटोइयाँ 3-कुम्हेरिया 4-तगारे 5- भुर्रक 6-सिकरोरिया 7-परसईंयां 8-बजरावत 9- रमैया 10-दीगिया 11-कांकर 12- पचौरी 13- प्रधान(पधान)
▪️ हर गाँव 20 विसा/विस्वा (१०० फीसद) का होता है हमारे गांव के गांव के तीनों थोक 10 विसा+1.25 विसा+2.5 विसा+ 6.25 विसा (डिरावली और और नहर पार वाले दोनों नगलों को मिलाकर बीस विसा बनता है। गाँव भरनाकलां तीन थोकों (सेक्टर्स/खण्डों) में बँटा हुआ है जिसके अंतर्गत "दश विसा", "ढाई विसा", "सवा विसा" आते हैं । भरनाकलां में स्वसमाज के 13 में से 11 उपगोत्र "दश विसे" में पाए जाते हैं । ढाई विसे में 3 व सवा विसे में 2 उपगोत्रों के लोग निवास करते हैं ।
🔸वर्तमान में स्वसमाज के सभी बच्चों के विवाह संबंधों में अपने माता- पिता के उपगोत्रों/अल्ल (इंटरनल गोत्र) को छोड़कर अन्य उपगोत्रों में से ही नया रिश्ता जोड़ा जाता है ।
1- बादर 2- सोती (सत्ल) 3- पचौरी 4-भाट (भटेले) 5-पधान 6-रतिवार 7- गौदाने (गौदानी) 8-तगारे 9-दीगिया 10- नुक़्ते (बरगला) 11-भुर्रक(भेड़े)12- रमैया 13-कुम्हेरिया 14-इटोईया 15-सीहइयाँ 16-सैंथरिया 17-बसइया 18-नन्दीसरिया 19-बजरावत 20-परसैंया 21-करिया 22-नालौठिया 23-दुरकी 24-विहोन्याँ 25-ओखले 26-करौतिया 27-मुडिनिया 28-गागर 29-डामर 30-गलवले 31-छिरा 32-जयन्तिया 33-डिड्रोइया 34-तसिये 35-दुर्गवार 36-दिरहरे 37-अझैयां 38-नायक 39-उमाड़िया 40-कांकर 41-रौसरिया 42-औगन 43-सिरौलिया 44-पलावार(पल्हा) 45- सिकरोरिया 46-चोचदिना 47-गलजीते 48- किलकिले 49-तागपुरिया 50-काठ
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🌏ब्रह्मर्षि सौभरि जी की ५० पत्नियों में से कुछ नाम तथा उनसे व्युत्पन्न सौभरेय अहिवासी ब्राह्मणों के अल्ल/अवंटको के नाम निम्नलिखित हैं:-
रानियों के नाम और उपगोत्र/अवंटक
1- बद्रिका- बादर
2- श्रोत्या- श्रोती अथवा सोती
3-पंचरी- पचौरी
4-गोदानी-गोदाने
5-भटी- भाट अथवा भटेले
6-प्रधानी-पधान
7-रतिवरी-रतिवार
8-तगन्या-तगारे
9-प्रलिहा-पल्हा अथवा पलावार
10- दीर्घा-दीगिया
11- श्रीकर्पूरी- सिकरोरिया
12-नुक्ता-नुक़्ते अथवा बरगला
13-भाविक्रा- भुर्रक
14-रमणीय-रमैया
15-कुंभार्या -कुम्हेरिया
16-ईड़ा-इटोइयाँ
17-सिंहमुग्रा- सीहइयाँ
18-सन्तरी-सैंथरिया
19-वासुकी-बसैया
20-नद्या -नंदिसरिया
21- बज्रावली- बजरावत
22-अजहा-अझैया
23-प्ररसी- परसईयां
🔹 स्वसमाज के कई गाँवों के नाम उपगोत्रों के नाम पर भी रखे गये हैं ।
जैसे-
गाँव- उपगोत्र
सैंथरी- सैंथरिया
सीह- सीहइयाँ
परसों- परसईयाँ
कुम्हेर- कुम्हेरिया
बहुत से गाँवों के नाम ब्रह्मर्षि सौभरि वंशजों की क्षेत्रीय उपाधि (अहिवासी) स्वरूप मिले नाम के साथ जुड़े हुए हैं जैसे-
नगला अहिवासी
अहिवासियों का पुरा ।
आज भी स्वसमाजी जन अपने उपगोत्र के मूलगाँव में छोटे बच्चों का मुंडन अपनी रीति- रिवाज के अनुसार ही कराते हैं । ऐसे गांवों में मघेरा गांव का नाम आता है यहां भुर्रक उपगोत्र के लोग निवास करते हैं यहाँ वे अन्य उपगोत्रों की तुलना में बहुलता में हैं ।
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✍️गोत्रीय शब्द से आशय उन व्यक्तियों से है जिनके आपस में पूर्वजों अथवा वंशजों की सीधी पितृ परंपरा द्वारा रक्त संबंध हों अर्थात् भाई, भतीजा, भतीजे के पुत्रादि गोत्रज कहलायेंगे । किसी भी एक जैसे उपगोत्र का पुरुष उसी उपगोत्र की कन्या से विवाह नहीं कर सकता था। एक समान उपगोत्र होने के कारण वो भाई-बहिन समझे जाते हैं । हिन्दू धर्म की सभी जातियों में गोत्र पाए गए है । गोत्र को लेकर आयुर्वेद में स्पष्ट रूप से लिखा है कि यदि समान प्रकार के रक्त में यदि मेल होता है और उससे संतान उत्पत्ति होती है तो उस संतान का रक्त अर्थात DNA कमजोर होगा जिससे उसमे कई प्रकार की बीमारियाँ होने की सम्भावना होती है जैसे की शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का कम होना ,शारीरिक विकृतियाँ होना, वंशानुगत बीमारियाँ होना आदि स्वाभाविक है। संस्कृत व्याकरण के रचनाकार महर्षि पाणिनि जी द्वारा गोत्र की परिभाषा- ‘अपात्यम पौत्रप्रभ्रति गोत्रम्’ अर्थात ‘गोत्र शब्द का अर्थ है बेटे के बेटे के साथ शुरू होने वाली (एक साधु की) संतान्। गोत्र, कुल या वंश ऐसी संज्ञा है जो उसके किसी मूल पुरुष के अनुसार होती है।
ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा
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