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Wednesday, June 16, 2021

ग्राम भरनाकलां के कुआ व कुइयाओं की संख्या


 मेरा गांव मेरा गर्व- 

कुआ व कुइओं का संरक्षण व संवर्धन होते रहना चाहिए ।

भरनाकलां गांव के आसपास के कुइया व कुओं का पानी खारी है, इन जलस्रोतों की खुदाई के समय से या कालांतर में जल की प्रकृति खारी हो गयी, पूर्णरूपेण कह नहीं सकते लेकिन फिलहाल गांव व गांव के आसपास की भूमि पर बने सभी जलस्रोत बहुत खारी हैं । हमारे पूर्वज जल संरक्षण के लिए कुआं खुदवाते थे। हर गांव में 10 से 15 कुआं होते ही थे। पुराने समय में जब बारात बगैराह आती थीं तो नेग के तौर पर या सेवाभाव के अनुसार कुछ कुआ और कुइयाओं के लिए लोटा , बाल्टी देने का रिवाज हुआ करता था । परम्परागत दृष्टि से कुआ, कुइया, पोखर खुदवाने की क्रिया को हमेशा से ही पुण्यकर्म की श्रेणी में रखा जाता रहा है । पारम्परिक जलस्रोत अतीत में पेयजल आपूर्ति में सक्षम थे, लेकिन आज आधुनिकता का शिकार होकर साल दर साल बंद होने की कगार पर हैं।

हमारे गांव भरनाकलां के कुइआ व कुओं का विवरण:- 

1-*फत्ती वाली कुइया(मीठी कुइया)*- सड़क के किनारे बम्बी पर स्थित है, कभी इस कुइया से सम्पूर्ण की ग्राम की स्वजातीय महिलाएं नीर भरण के लिए आती थीं, जब से पाइपलाइन की व्यवस्था ग्राम में हुई है तब से यह परम्परा बन्द हो गयी । फिलहाल कुइया अभी चालू हालत में है ।

2- बघेलों वाली कुइया- छाता-गोवर्धन रोड पर स्थित है फिलहाल इससे नीरभरण बंद है।

3- हरिजनों वाली कुइया- ये कुइया भी पास में ही है इसी रोड पर । फिलहाल बन्द पड़ी है ।

4- जाटवों वाली कुइया- भंगियों वाली कुइया के पास स्थित है । अभी पानी भरना बन्द है ।

5- दर्जियों वाली कुइया- स्कूल फार्म के पास , पानी भरना बन्द ।

6- बलवीर भगत जी वाली कुइया- स्कूल फार्म के सामने , कभी-कभार प्रयोग लेते हैं ।

 7- रग्गो दादा वाली कुइया- बन्द

8- प्याऊ वाली कुइया (खारी कुइया)- नहाने के लिए अभी चालू हालत में है ।

9- गांव वाली खारी कुइया- फिलहाल पाट दी गयी है । कभी यह दश विसे की औरतों के नहाने की मुख्य कुइया और भैंसों की सानी करने के लिए पानी की मुख्य धारा  थी।

10- सरकारी स्कूल वाला कुआ- फ़िलहाल पटा हुआ है ।

11- मरघट वाला कुआ- बन्द पड़ा है । 

12- भैंमी बाबा वाला कुआ- कभी-कभार प्रयोग में ।

13- गौरी इटोइयाँ जी वाली कुइया- बंद पड़ी है ।

14- अटीलेवालेन वाला कुआ- बम्बा पर स्थित है, कभी-कभार उपयोग में

15- मुकदमों वाली कुइया(दश विसा)- बन्द पड़ी है ।

16- मुकदमों वाला कुआ(दश विसा)- अटा दिया गया ।

17- हवेली वाली कुइया- चालू हालत में, पर कम  उपयोग में

18- सट्ठान वाली कुइया- लीडो बम्बी के पास छाता-गोवर्धन रोड पर स्थित है । ना के बराबर उपयोग में

19- नैवासीन वाली कुइया- भरतपुर फीडर बम्बा पर स्थित है, अभी चालू हालत में ।

 20- बाबाजी वाला कुआ- उपयोग में नहीं 

21- कुम्हेरियन वाली कुइया

22- मन्ने वालेन की कुइया

23- कमरावालेन वाला कुआ

24- काइयाँन वाली कुइया

25- सेलवालेन वाली कुइया

26- बड़े मंदिर के पीछे वाला कुआ- बंद पडा है ।

27- मढ़ी वाला कुआ- पोखर के पास, बंद पड़ा है ।

28- नाले के पास वाला कुआ- बंद पड़ा है ।

29- मुहारी वाली कुइया कभी- कभार उपयोग में ।

30- नहर वाली कुइया-

31- मुखिया वाली कुइया

30- पारुआ वाली कुइया

31- कलेट्टर जी वाला कुआ (नद्या)

32- खिल्लू बाबा वाली कुइया

33- नम्बरदारन वाली कुइया

34- अक्खड़ों वाली कुइया

35- स्कूलफार्म वाली कुइया, पाट दी गयी

36- चरन मास्टर जी वाली कुइया

37-चंदा जी वाली कुईया

38- सोना वारी कुईया

39- गुल्लनपंडा जी वाली कुइया

इसके अतिरिक्त गांव में और भी कुइआ व कुआ हो सकते हैं जितना मालूम था उतना लिख दिया है।

🔸 आज स्थिति यह है कि गांव में  चलते हुए एक-दो कुआं मिल जाए तो समझे की जल संचय की दिशा में अब भी ग्रामीण जागरूक हैं। पहले कुआं के पानी से भोजन बनाने, पानी पीने एवं पूजा करने  का काम होता था। हमारी संस्कृति कुआं के पानी को शुद्ध मानती है। कुएं को कूप भी कहा जाता है । कुएं को खोदकर, ड्रिल करके, या बोर बनाया जाता है । कुएं को जीवन और उर्वरता का प्रतीक माना जाता है । कुएं के पानी का महत्व कम होता जा रहा है । कुएं का पानी पीने के साथ-साथ सिंचाई के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था । कुएं के पानी पर पर्यावरण में होने वाले बदलावों का असर पड़ता है । जब पेयजल व्यवस्था चरमरा जाती है, तब इन कुओं की उपयोगिता बढ़ जाती है। लोग कुआं और हैंडपंप के माध्यम से पेयजल एवं निस्तार जल का उपयोग करते हैं। दो दशक पहले जब हैंडपंपों की कमी और नलजल योजना का अभाव था तब कुआं ही ऐसा साधन था। 

हिंदू धर्म में कुआं पूजन की परंपरा का विशेष महत्व होता है। कुआं पूजन पुत्र प्राप्ति पर किया जाता है। साथ ही यह ग्रह-नक्षत्रों को शांति के लिए भी किया जाता है। खासतौर से मूल नक्षत्रों में जन्मे बच्चों के लिए यह पूजा जरूरी मानी गई है। कई स्थानों पर इसे जल पूजा या जलवा पूजा भी कहा जाता है। रिक्ता तिथि यानी शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी को छोड़कर, अन्य किसी भी तिथि पर कुआं पूजन संस्कार किया जा सकता है। वहीं, कुआं पूजा के लिए सोमवार, बुधवार और गुरुवार का दिन अच्छा माना गया है। साथ ही चैत्र और पौष चंद्र महीनों को छोड़कर, सभी चंद्र महीने कुआं पूजा अनुष्ठानों किया जा सकता है। मृगशीर्ष, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, अनुराधा, मूल और श्रवण नक्षत्र भी कुआं पूजन संस्कार के लिए अच्छे माने जाते हैं। हिंदू धर्म में शादी-विवाह संस्कारों में भी बच्चे का कुआं पूजन किया जाता है। कुएं पूजन समारोह आमतौर पर नवजात शिशु के जन्म के 11वें दिन किया जाता है ।

 ▪️कुएं का आकार हमेशा गोल होता है:- 

किसी दूसरे आकार की तुलना में गोल कुआं ज्यादा मजबूत होता है और अपनी जगह पर स्थिर रहता है। आपको बता दें कि जब भी किसी द्रव को कहीं भी स्टोर किया जाता है तो द्रव उसकी दीवारों पर प्रेशर डालता है। अगर कुआं किसी अन्य आकार का होता तो पानी का प्रेशर उस आकार के कोनों की दीवारों पर सबसे ज्यादा पड़ता जिसकी वजह से कुएं की दीवारों को नुकसान भी पहुंचता है।गोल होने की वजह से कुएं में कोई भी कोना नहीं होता है। जिस वजह से पानी का प्रेशर भी हर तरफ एक समान ही पड़ता है और कुएं को जल्दी कोई भी नुकसान नहीं होता है।

ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा

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