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Tuesday, October 22, 2019

ब्लॉक प्रमुख चुनाव , कार्य, अधिकार आदि के बारे में जानें?

 ब्लॉक,  ग्राम पंचायत और जिला परिषद के मध्य की कड़ी होती है।इस संस्था का विभिन्न राज्यों में भिन्न नाम हैं। उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश में इसे मंडल प्रजा परिषद्, गुजरात में तालुका पंचायत और कर्नाटक में मंडल पंचायत के नाम से जाना जाता है।

ब्लाक क्या होता है ? -
राज्यों को जिले में विभाजित किया जाता है, प्रत्येक जिले को ब्लॉक में विभाजित किया जाता है, ब्लॉक को ग्राम पंचायत में विभाजित किया जाता है, ग्राम पंचायत को गावं में विभाजित किया जाता है, एक जिले में कई ब्लॉक होते है|

ब्लाक प्रमुख का चुनाव
प्रत्येक पांच वर्ष में ग्राम प्रधान और क्षेत्र पंचायत सदस्य का चुनाव कराया जाता है| इनका निर्वाचन गावं की जनता द्वारा किया जाता है, इसके बाद निर्वाचित हुए क्षेत्र पंचायत सदस्यों में से किसी एक का  मतदान के द्वारा ब्लॉक प्रमुख के पद पर चयन किया जाता है, ब्लॉक प्रमुख के चुनाव में केवल क्षेत्र पंचायत सदस्य ही मतदान कर सकते है |

ब्लाक प्रमुख कार्य और अधिकार - 

ब्लाक प्रमुख पंचायत समिति की बैठक का आयोजन, अध्यक्षता तथा संचालन करता है
ब्लाक प्रमुख पंचायत समिति या स्थायी समिति के निर्णयों का कार्यान्वयन करता है
ब्लाक प्रमुख पंचायत समिति की वित्तीय और कार्यपालिका प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण रखता है
ब्लाक प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित जान माल को तत्काल राहत देने के लिये उसे एक वर्ष में कुल पच्चीस हजार रूपये तक की राशि स्वीकृत करने की शक्ति प्रदान की गयी है, राशि स्वीकृत करने के बाद उसे पंचायत समिति की अगली बैठक में स्वीकृत राशि का सम्पूर्ण विवरण देना होगा।

ब्लाक प्रमुख का वेतन - 
अब ब्लाक प्रमुख को ७ हजार रुपये महीना मानदेय प्रदान किया जाता है, इसके अतिरिक्त ब्लॉक प्रमुख को कई प्रकार के भत्ते प्रदान किये जाते है |


तहसीलदार के कौन-कौन से काम होते हैं?


भूमि से संबंधित विवाद सुनना तथा समस्या का निदान करना
पटवारी द्वारा किये गये कार्यो का पर्यवेक्षण करना
यह सुनिश्चित करना, कि भूमि अभिलेख ठीक से रखा गया है
भूमि राजस्व का उचित संग्रह सुनिश्चित करना
यह सुनिश्चित करना कि किसान आसानी से अपने रिकॉर्ड की प्रति प्राप्त कर सकें
 छात्रों के लिए जाति प्रमाण पत्र, निवास, आय तथा विभिन्न प्रकार के प्रमाण पत्र तहसीलदार के हस्ताक्षर द्वारा मान्य होते है
भूमि अधिग्रहण और संपत्ति अधिग्रहण के मामलों को उनके कार्यालय द्वारा तैयार किया जाता है,  किसी भी प्राकृतिक आपदा या बाधाओं से होने वाली हानि के लिए तत्काल राहत अभियान प्रारंभ करना इनका प्रमुख कार्य है
किसी भी कारण और फिक्सिंग के कारण फसलों का कुल नुकसान का मूल्यांकन कर, इसका मुआवजा तहसीलदार द्वारा प्रबंधित किया जाता है
तहसीलदार अपनें तहसील के बीज और उर्वरक आवश्यकताओं के लिए खाद्य पदार्थों और आपूर्ति पर नज़र रखता है

जन वितरण प्रणाली (कोटा ) क्या है ?


भारत के गांव और शहरों में कम कीमत में राशन देना यह जन वितरण प्रणाली का काम है। इसमें आपको चावल ,गेहूँ ,चीनी , नमक, केरोसिन तेल आदि जैसी वस्तुएं कम कीमत में मिलती है। जन वितरण प्रणाली सरकार के द्वारा चलाई गयी योजना है जो की वर्षों से भारत के लोगों को सेवा प्रदान कर रही है।
इसमें हरेक गांव /वार्ड में राशन का दुकान खोला जाता है -जिसका नाम कोटा रखा जाता है और दुकानदार को डीलर के नाम से जाना जाता है। हर एक कोटा डीलर का अपना एक लाइसेंस नंबर होता है ,जिससे की वह राशन उठा और बेच पाता है।

जन वितरण प्रणाली का भाव

जैसा की मैंने पहले ही बता दिया है कि इसकी सामान की भाव बोहोत ही कम है। जिसकी जानकारी नीचे दी गयी है।
चावल - Rs 1 /kg
गेहूँ    - Rs 1 /kg
नमक- Rs 1 /kg
चीनी - Rs 24 /kg
केरोसिन तेल - Rs 29.35/lt
आदि ।

जन वितरण प्रणाली का लाभ कौन उठा सकते है?

ऐसा व्यक्ति जो भारत का नागरिक हो और सरकारी कर्मचारी ना हो। तो वह जन वितरण प्रणाली के अंतर्गत सामान खरीद सकता है। जिसके लिए आपको लाल कार्ड ,पीला कार्ड बनवाना पड़ता है।

जन भंडार वितरण प्रणाली दुकान कैसे चलती है?

सबसे पहले दुकानदार को महीने में आवंटन (allotment ) आता है कि आपको इस महीने इतना सामान भंडार से उठाना है। दुकानदार उन सामानों का draft बनाता है और उसे भंडारे से खरीद लाता है और फिर वह उस सामान को लोगों में वितरण कर देता है। यह वितरण, मशीन के द्वारा होती है ,लोगों को राशन खरीदने के लिए अपना अंगूठा मशीन में लगाना पड़ता है उसके बाद ही वह राशन ले पाता है। दुकानदार अपने register में कार्ड नंबर और राशन की मात्रा लिखता है ।

पटवारी की क्या जिम्मेदारी होती है?

पटवारी  विभाग का कार्यकर्ता होता है। इन्हें भिन्न-भिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न नामों से भी जाना जाता है जैसे- पटेल, कारनाम अधिकारी, शानबोगरु आदि। पटवारी भारतीय उपमहाद्वीप के ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार का प्रशासनिक पद होता है। पटवारी को लेखपाल भी कहा जाता है।

 पटवारी के कार्य-

पटवारी ग्राम स्तर पर एक कर्मचारी होता है। जिसके क्षेत्र में एक या एक से अधिक गांव आते है तथा पटवारी इन गावों की भूमि का पूर्ण विवरण रखते है। जैसे- एक किसान के पास कितनी भूमि है, इस पर लगान क्या है व भूमि किस किस्म की है। यह सब जानकारी पटवारी रखता है।

किसी भूमि का क्रय विक्रय पटवारी (लेखपाल) की सहायता द्वारा ही संपन्न होता है।
पटवारी राजस्व अभिलेखों को अपडेट रखता है।
पटवारी भूमि का आवंटन करता है।
पटवारी आपदाओं के दौरान, आपदा प्रबंधन अभियानों में सक्रिय रूप से अपना सहयोग देता है।
पटवारी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के खेतों के हस्तांतरण का कार्य करता है।
पटवारी राष्ट्रीय कार्यकर्मो में भी सहयोग के साथ साथ कृषि गढ़ना, पशु गरणा, तथा अन्य आर्थिक सर्वेक्षण में सहयोग देते है।
पटवरी विकलांग पेंसन, वृद्धावस्था, आय व जाति प्रमाण पत्र बनवाने में आवेदकों की सहायता करता है।

वार्ड सभा की संरचना को जानिये ।


हम जानते हैं कि वार्ड सभा पंचायती राज व्यवस्था की सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई है। पंचायत अनेक वार्डों में विभाजित होता है। प्रत्येक वार्ड का एक निर्धारित निर्वचान क्षेत्र होता है। वार्ड स्तरीय मतदाता निर्वाचन क्षेत्र के अंदर रहने वाले सभी मतदाता वार्ड सभा के सदस्य होते हैं। ग्राम सभा की तरह ही वार्ड सभा एक स्थायी निकाय है और पंचायती राज व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग। ओड़ीसा जैसे राज्य में यह किसी राजस्व ग्राम के सभी मतदाताओं से मिलकर बनती है और पल्ली सभा कहलाती है।

वार्ड सभा ग्राम पंचायत के प्रत्येक सभा में गठित होना चाहिए। ग्राम पंचायत का निर्वाचित सदस्य जो वार्ड का प्रतिनिधित्व करता है वार्ड सभा की बैठकों का संयोजन और अध्यक्षता करता है। वार्ड सभा की बैठक प्रत्येक तीन महीने पर होगी ।
यदि वार्ड प्रतिनिधि किसी भी कारण से बैठक आयोजित करने में विफल रहता है तो ग्राम पंचायत अध्यक्ष/उपाध्यक्ष बैठक आयोजित कर सकते हैं और उसकी अध्यक्षता कर सकते हैं।
वार्ड सभा की बैठकों का कोरम (वार्ड सभा के सदस्यों की न्यूतम उपस्थिति संख्या) का पालन करना अनिवार्य है। कोरम पूरा करने के लिए वार्ड के सदस्यों की संख्या का दशवां हिस्सा उपस्थित रहना जरूरी है।
वार्ड सभा की शक्तियां और जिम्मेदारियां
वार्ड सभा के कर्तव्य और कार्य ग्राम सभा के ही समान हैं। राज्य पंचायती राज अधिनियम के अनुसार वार्ड सभा की शक्तियां और कर्तव्य इस प्रकार हैं :

प्रस्ताव तैयार करना और वार्ड सभा के क्षेत्र में लागू की जाने वाली योजनाओं तथा विकास कार्यक्रमों की प्राथमिकता तय करना और फिर उसे ग्राम पंचायत विकास योजना में शामिल किए जाने के लिए ग्राम सभा के समक्ष रखना।
निर्धारित मानदंडों के आधार पर योजना के लाभार्थी के रूप में सर्वाधिक उपयुक्त व्यक्तियों की पहचान करना;
पेंशन और अनुदान पाने जैसी विभिन्न सरकारी कल्याण योजनाओं का लाभ पाने वाले व्यक्तियों की पात्रता का सत्यापन करना;
वार्ड सभा के क्षेत्र से संबंधित ग्राम पंचायत के प्रत्येक निर्णय के औचित्य पर ग्राम पंचायत से जानकारी प्राप्त करना;
विकास कार्य के लिए स्वैच्छिक श्रम जुटाना और नकद और अंशदान दिलाना तथा स्वैच्छिक समूहों से ऐसे विकास कार्यों का पर्यवेक्षण करवाना;
यह सुनिश्चित करने के लिए प्रयास करना कि वार्ड सभा के सदस्य ग्राम पंचायत को करों और शुल्कों का (यदि कोई हो तो) भुगतान करें;
मुखिया के अनुरोध पर वार्ड सभा के अंदर स्ट्रीट लाइटों, सड़कों के किनारे या सामुदायिक पानी के नल, सार्वजनिक शौचालय तथा ऐसे ही अन्य जनोपयोगी योजनाओं के लिए स्थान सुझाना;
स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण जैसे सार्वजनिक हित के विषयों पर जागरुकता फैलाना;
वार्ड सभा के क्षेत्र में सफाई की व्यवस्थाओं में ग्राम पंचायतों के कर्मचारियों की मदद करना और कचरा हटाने में स्वैच्छिक सहयोग देना;
वार्ड सभा के क्षेत्र में वयस्क शिक्षा के कार्यक्रम को बढ़ावा देना;
वार्ड सभा के क्षेत्र में सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों की गतिविधियों में सहयोग करना खासकर बीमारियों की रोकथाम और परिवार कल्याण योजना में तथा महामारियों और प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में जल्द सूचना भेजने की व्यवस्था करना;
वार्ड सभा के क्षेत्र में लोगों के विभिन्न समूहों के बीच एकता और भाईचारा बढ़ाना तथा इलाके के लोगों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर देने हेतु सांस्कृतिक उत्सवों और खेल आयोजनों का प्रबंधन करना; और अन्य सभी शक्तियों का उपयोग करना और ऐसे कर्तव्यों का पालन करना जिनका प्रावधान हो।
वार्ड सभा के सभी निर्णय एकमत होकर अथवा बहुमत के अनुमोदन से लिए जाते हैं। बैठक में उपस्थिति लोगों के मतदान के आधार पर बहुमत का निर्धारण होता है।

ग्राम पंचायत के खर्चे का विवरण जानने के लिए सूचना के अधिकार का प्रयोग करें

ग्राम पंचायत के खर्चे का विवरण जानने के लिए सूचना के अधिकार का प्रयोग करें

Open Link-

सूचना के अधिकार के लिए आवेदन करने के कुछ सैंपल /मॉडल

सेवा में,
लोक सूचना अधिकारी
(विभाग का नाम)
(विभाग का पता)

विषय : सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत आवेदन।

महोदय,
..................ग्राम पंचायत के संबंध में निम्नलिखित विवरण प्रदान करे:

1. वर्ष.............के मध्य..................ग्राम पंचायत को किन-किन मदों/याजनाओं के तहत कितनी राशि आंवटित की गई? आवंटन का वर्षवार ब्यौरा दें।

2. उपरोक्त ग्राम पंचायत द्वारा इस दौरान कराए गए सभी कार्यो से संबंधित निम्नलिखित विवरण दें:

क. कार्य का नाम
ख. कार्य का संक्षिप्त विवरण
ग. कार्य के लिए स्वीकृत राशि
घ. कार्य स्वीकृत होने की तिथि
ड. कार्य समाप्त होने की तिथि अथवा चालू कार्य की स्थिति
च. कार्य कराने वाली एजेंसी का नाम
छ. कार्य शुरू होने की तिथि
ज. कार्य समाप्त होने की तिथि
झ. कार्य के लिए ठेका किस दर पर दिया गया?
ञ. कितनी राशि का भुगतान किया जा चुका है
ट. कार्य के रेखाचित्र की प्रमाणित प्रति
ठ. कार्य कराने का निर्णय कब और किस आधार पर लिया गया? इससे संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रति भी उपलब्ध कराएं।
ड. उन अधिकारियों/कर्मचारियों का नाम व पद बताएं जिहोंने कार्य का निरीक्षण किया और भुगतान की स्वीकृति दी।
ढ. कार्य के वर्क ऑर्डर रजिस्टर एवं लेबर रजिस्टर/मस्टर रोल की प्रति उपलब्ध कराएं।

3. उपरोक्त ग्राम पंचायत में वर्ष........के दौरान कार्यो/योजनाओं पर होने वाले खर्चों की जानकारी निम्न विवरणों के साथ दें:

क. कार्य का नाम जिसके लिए खर्च किया गया
ख. कार्य का संक्षिप्त विवरण
ग. कार्य के लिए स्वीकृत राशि
घ. कार्य कराने वाली एजेंसी का नाम
ङ. कार्य शुरू होने की तिथि
च. कार्य के रेखाचित्र की प्रमाणित प्रति,
छ.कार्य कराने का निर्णय कब और किस आधार पर लिया गया? इससे संबंधित दस्तावेजों की प्रति भी उपलब्ध कराएं।

मैं आवेदन फीस के रूप में 10रू अलग से जमा कर रहा /रही हूं।

या
मैं बी.पी.एल. कार्ड धारी हूं इसलिए सभी देय शुल्कों से मुक्त हूं। मेरा बी.पी.एल. कार्ड नं..............है।

यदि मांगी गई सूचना आपके विभाग/कार्यालय से संबंधित नहीं हो तो सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6 (3) का संज्ञान लेते हुए मेरा आवेदन संबंधित लोक सूचना अधिकारी को पांच दिनों के समयावधि के अन्तर्गत हस्तान्तरित करें। साथ ही अधिनियम के प्रावधानों के तहत सूचना उपलब्ध कराते समय प्रथम अपील अधिकारी का नाम व पता अवश्य बतायें।

भवदीय

नाम:
पता:
फोन नं:
संलग्नक:
(यदि कुछ हो)

ग्राम पंचायत के लिए बजट क्यों आवश्यक है?

पंचायत बजट क्या है?

पंचायतों के लिए बजट उसके एक वित्तीय वर्ष के कार्यक्रम का दस्तावेज होता है। यह एक ऐसा प्रस्ताव होता है जिसमें एक वित्तीय वर्ष में विभिन्न मदों पर होने वाले व्यय तथा वित्त उपलब्ध कराने वाले साधनों की विवरणी होती है। 

पंचायत के लिए बजट क्यों आवश्यक है?

प्रत्येक पंचायत को प्रभावशाली रूप में काम करने तथा अपने दायित्वों एवं कर्तव्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक संसाधन की जरूरत होती है। इस प्रकार संसाधन को जुटाने एवं अपने व्ययों को पूरा करने के लिए पंचायत को बजट तैयार करना आवश्यक होता है।

बजट से पंचायत को क्या लाभ है?

बजट से पंचायत को निम्नवत लाभ होता है :

1. पंचायतों को आर्थिक नीतियों को पालन करने में सहूलियत होती है।
2. उनका आर्थिक स्थिति आसानी से मालूम हो जाता है।
3. पंचायत में संभावित आर्थिक विकास का अनुमान भी बजट से लगाया जा सकता है।
4. पिछले वर्ष में प्राप्त आय एवं किए गए व्यय का वास्तविक स्थिति का पता चलता है।
5. अगामी वर्ष में प्राप्त होने वाले आय एवं होने वाले व्यय का अनुमान लग जाता है।
6. पंचायत में कार्यान्वित योजनाओं एवं कार्यक्रमों का प्रगति मालूम होता है।
7. कर लगाने में सहूलियत होती है।
8. पंचायत को अपना कार्य करने में सहयोग मिलता है।
9. पंचायतों को अपना राजस्व जुटाने में आसानी हो जाता है।
10. आय-व्यय घटाने एवं बढ़ाने में सहयोग मिलता है।

बजट किस अवधि के लिए बनाया जाता है?

वर्तमान में वित्तीय वर्ष पहली अप्रैल से 31 मार्च तक की अवधि ही प्रचलन में है तथा इसी अवधि के लिए बजट बनाने का प्रावधान है और बनाया जाता है।

बजट के घटक या अवयव:-

सामान्यत: किसी भी बजट के दो मुख्य घटक होते है, पहला प्राप्तियां और दूसरा व्यय। 
(अ) प्राप्तियां -  इसमें एक वित्तीय वर्ष में विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होने वाले आय को रखा जाता है। उल्लेखनीय है कि पंचायतों को वर्तमान में अपना कोई आय का स्रोत नहीं है, उन्हें केंद्र या राज्य सरकार द्वारा फंड प्राप्त हो रहे है। वर्तमान में पंचायत को चार स्रोतों से वित्तीय सहायता प्राप्त हो रहे हैं।

1. पिछड़ा क्षेत्र अनुदान फंड (बीआरजीएफ)
2. तेरहवीं वित आयोग
3. चर्तुथ राज्य वित आयोग
4. मनरेगा।

संवैधानिक प्रावधान क्या है?

संविधान के अनुच्छेद 40 में भी पंचायतों के शक्तियां एवं अधिकार का उल्लेख है जिसमें पंचायतों को सौपें गए 29 कार्यों में से वार्षिक बजट बनाना एक मुख्य कार्य है। ग्राम पंचायत द्वारा बनाए जाने वाले वार्षिक बजट पर विचार-विमर्श कर सिफारिश करना ग्राम सभा का कार्य निर्धारित किया गया है। 

पंचायत के बजट में निम्नवत मुख्य होते है-

1. इसमें विगत वर्ष के वास्तविक आय और व्यय का पुनरावलोकन होता है।
2. वर्तमान वर्ष के लिए आय और व्यय का प्राक्कलन होता है।
3. अगामी वर्ष के लिए आवश्यकताओं के पूरा करने का प्रावधान होता है।

उल्लेखनीय है कि बजट प्राक्कलन में राजस्व व्यय, पूंजी व्यय और ऋण पर होने वाले व्यय को अलग-अलग प्रदर्शित किया जाता है।

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बजट बनाना एक तकनीक है- 

बजट बनाने के लिए ग्रामसभा को तकनीकी पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए। बजट को दो भागों में बांटना चाहिए। पहला राजस्व व्यय और दूसरा पूंजीगत व्यय।

राजस्व व्यय : चालू व्ययों को पूरा करने के लिए किए जाने वाले व्यय तथा विकास कार्यों पर होने वाले व्यय को राजस्व व्यय में शामिल किया जाता है। इसमें पंचायत द्वारा निम्नवत मद पर किए गए व्यय को शामिल किया जाना चाहिए-

1. सरकारी सेवाओं पर होने व्यय।
2. सब्सिडी पर व्यय।
3. ब्याज पर किया गया व्यय।
4. सामाजिक एवं सामूहिक सेवाओं पर किया गया व्यय।
5. कृषि एवं सिंचाई पर व्यय।
6. विद्युत पर व्यय।
7. सूखाराधन एवं बाढ़ नियंत्रण आदि पर व्यय।
8. मनरेगा योजना के तहत इन कार्यों पर किए गए व्यय को राजस्व व्यय में सम्मिलित करना चाहिए।
9. जल सरंक्षण एवं जल संचय से संबंधित योजना।
10. सूखा से बचाव के लिए किया गए वनारोपण।
11. सिंचाई के लिए सूक्ष्म और लघु सिंचाई परियोजना सहित नहर निर्माण।
12. तालाब निर्माण।
13. भूमि विकास।
14. परंपरागत जल निकायों का जीर्णोंद्धार।
15. बाढ़ नियंत्रण एवं सुरक्षा परियोजनाएं।
16. कृषि से संबंधित कार्य जैसे एनइडीपी कंपोस्टिंग, वर्मी कंपोस्टिंग, जैव खाद आदि।
17. पशुधन संबंधी कार्य यथा मुर्गीपालन शेल्टर, बकरी शेल्टर, मवेशयों के लिए फर्श निर्माण, यूरीन टैंक एवं नाद का निर्माण आदि।
18. मत्स्य पालन संबंधी कार्य।

वर्तमान में ये सभी कार्य पंचायतों द्वारा किए जा रहे हैं। इसलिए बजट बनाते समय उन पर किए गए व्यय को राजस्व व्यय में दिखाया जाना चाहिए।

पूंजीगत व्यय: इसमें वैसे व्यय को सम्मिलित किया जाता है, जिससे कोई नयी परिसंपत्ति सृजित होती है तथा उसका लाभ कई वर्षों तक मिलता है। वर्तमान में पंचायत में बीआरजीएफ, मनरेगा, तेरहवीं वित एवं चर्तुथ राज्य वित आयोग के तहत स्थायी परिसंपतियों के सृजन के उद्देश्य से बड़े पैमाने पर कार्य कराए जा रहे हैं यथा। ये कार्य है-

1. आंगनबाड़ी केंद्र भवनों का निर्माण।
2. पंचायत सरकार भवनों एवं मनरेगा भवनों का निर्माण।
3. प्रखंड-सह-अंचल कार्यालय एवं आवासीय भनवनों का निर्माण तथा उनका रख-रखाव का कार्य।
4. खेल मैदानों का निर्माण।
5. व्यक्तिगत पारिवारिक शौचालय, विद्यालयी शौचालय, आंगनबाड़ी शौचालय का निर्माण।

आयोजना व्यय : कर्मचारियों का वेतन, पेंशन एवं भत्ता, कार्यालय पर किए गए व्यय, सामाजिक-आर्थिक एवं कल्याण से संबंधित योजनाओं पर किया गया व्यय।

गैर आयोजना व्यय: ब्याज की अदायगी, न्यायालय से संबंधित व्यय, प्राकृतिक आपदा के अवधि में किया गया व्यय।

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बजट के प्रकार-

पारंपरिक बजट: बजट के प्रारंभिक स्वरूप को पारंपरिक बजट कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य सरकारी व्ययों पर नियंत्रण करना होता है। विकास का स्वरूप क्या हो इसका उल्लेख नहीं रहता है। इस कारण वर्तमान इस प्रकार के बजट प्रचलन में नहीं है।

पंचायतों को बजट बनाते समय इन स्वरूपों में से अंतिम दो स्वरूपों को अपनाया जा सकता है। इससे पंचायत को विकास कार्यों से संबंधित रणनीति बनाने में सहूलियत होगी। उल्लेखनीय है कि बजट वर्तमान योजनाओं के नवीनीकरण और समीक्षा का मौका देता है ताकि सही दिशा में व्यय हो सके। अतएव पंचायतों को भी विकासात्मक स्वरूप को अपनाना चाहिए।निष्पादन बजट : जब कार्य या परिणाम या लक्ष्यों को प्राप्ति के आधार पर बजट बनाया जाता है ,तो उसे निष्पादन बजट कहा जाता है। इसमें आय-व्यय के लेखा-जोखा होने के साथ कार्य निष्पादन के मूल्यांकन का आधार बनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि प्रथम हूपर आयोग ने सर्वप्रथम 1949 में इस प्रकार के बजट की अनुशंसा की थी।

पूंजी बजट : इस प्रकार के बजट में केवल पूंजीगत प्राप्तियों एवं व्ययों को ही शामिल किया जाता है।

आउटकम बजट: इस प्रकार के बजट में भौतिक लक्ष्यों का निर्धारण गुणवत्ता को ध्यान में रख कर किया जाता है। कार्य निष्पादन हेतु निर्धारित राशि को सही समय, सही गुणवत्ता तथा सही मात्रा में उपलब्ध कराने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाती है, उल्लेखनीय है कि इस प्रकार के बजट सबसे पहले 2005 में बना था।

शून्य आधारित बजट: ऐसे बजट में प्रस्तावित व्ययों के प्रत्येक मदों को एक नई मद मानकर प्रदर्शित किया जाता है। अर्थात प्रत्येक मद को शून्य मान कर उसे मूल्यांकित किया जाता है तथा सभी योजनाओं एवं कार्यक्रमों का मूल्यांकन या समीक्षा गहनता से की जाती है। उल्लेखनीय है कि इस प्रकार के बजट की शुरुआत सर्वप्रथम 1986-87 के बजट से किया गया था।

जेंडर बजट: जब बजट को लिंग विशेष के आधार पर तैयार किया जाता है, तो उसे जेंडर बजट कहा जाता है। सामान्यत: इस प्रकार के बजट में महिलाओं के लिए अलग से रणनीति तैयार किया जाता है। उनके विकास, कल्याण और सशक्तीकरण से संबंधित योजनाओं एवं कार्यक्रमों के लिए एक निश्चित धन राशि की व्यवस्था की जाती है।

पंचायतों को बजट बनाते समय इन स्वरूपों में से अंतिम दो स्वरूपों को अपनाया जा सकता है। इससे पंचायत को विकास कार्यों से संबंधित रणनीति बनाने में सहूलियत होगी। उल्लेखनीय है कि बजट वर्तमान योजनाओं के नवीनीकरण और समीक्षा का मौका देता है ताकि सही दिशा में व्यय हो सके। अतएव पंचायतों को भी विकासात्मक स्वरूप को अपनाना चाहिए।

बजट का दृष्टिकोण स्पष्ट कर देना चाहिए त्रकर लगाने और वसूली के लिए नीति निर्धारित होनी चाहिए। हालांकि अभी कर का निर्धारण सरकार द्वारा किया जाता है।

बजट का दृष्टिकोण स्पष्ट कर देना चाहिए- 

1. कर लगाने और वसूली के लिए नीति निर्धारित होनी चाहिए। हालांकि अभी कर का निर्धारण सरकार द्वारा किया जाता है।
2. प्राथमिकताओं को सुनिश्चित कर लेनी चाहिए। इसके लिए आम जनता की आवश्यकता को ध्यान में रखना चाहिए।
3. बजट में सामाजिक-आर्थिक प्रक्षेत्र के अनुसार व्यय का प्रावधान करना चाहिए यथा कृषि, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि।
4. संविधान द्वारा प्रदत्त 29 विषयों को ध्यान में रखना चाहिए।
5. बजट का प्राक्कलन तैयार करते हेतु किसी लेखा या बजट के जानकार से अवगत हो लें।
6. संसाधन के मद्देनजर ही अगामी वर्षों के लिए आवश्यकताओं को पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिए।
7. ग्राम सभा में बजट पर अवश्य चर्चा की जाए।

बजट निर्माण में पंचायत के समक्ष चुनौतियां

1. ग्राम पंचायत को अपना बजट बनाने, उस पर चर्चा करने तथा उसे अनुमोदित करने के लिए प्रावधान है। वे अपना आय-व्यय का वाक आकलन कर सकती है। लेकिन पंचायत को बजट निर्माण के समक्ष कई चुनौतियां है, जिसके कारण यह व्यावहारिक रूप में अमल में नहीं है।
2. पंचायतों को कोई अपना आय का स्रोत नहीं है।
3. टैक्स लगाने एवं वसूलने के संबंध में नियमावली नहीं बनने से उन्हे इसे संबंध में अधिकार प्राप्त नहीं हो पाई है।
4. पंचायतों में राजस्व उगाही का साधन यथा हाट, बाजार, मेला वाहन स्टैंड आदि सीमित है, जिसके कारण आय को वे नहीं बढ़ा सकते है।
5. पंचायतों के पास वैसे कर्मियों की कमी है, जिनसे बजट का निर्माण कराया जा सके। हालांकि सरकार इस दिशा में प्रयासरत है।

ग्राम पंचायत को कितना पैसा मिला, और कहाँ-कहाँ किया गया है खर्च । आओ जानें


अगर आप जानना चाहते हैं कि भारत सरकार ने आपकी ग्राम पंचायत में किस निर्माण के लिए कितना बजट दिया है, कितना पास करवाया गया है और कितना काम अब तक कराया गया है तो यह आप घर बैठे अपने मोबाइल के जरिए एक क्लिक पर जान सकते हैं। इतना ही नहीं, अगर आपको निर्माण कार्य में कोई अनियमितता नजर आती है तो आप जनसुनवाई में सीधे शिकायत कर सकते हैं। भारत सरकार ने गाँव-गाँव में विकास कार्य को पारदर्शी बनाने के लिए इस सुविधा की शुरुआत की है। आप इन तरीकों को अपना कर अपने प्रधान, जिला पंचायत पर भी नजर रख सकते हैं।

ऐसे मिलेगी जानकारी- 
अपनी ग्राम पंचायत के विकास कार्यों को लेकर जानकारी के लिए आपको वेबसाइट लिंक पर क्लिक करना होगा।
Plan Year : (वित्तीय वर्ष)- विकल्प में तय करें कि आपको किस साल की जानकारी लेनी है। जैसे 2017-2018, 2016-2017 या 2015-2016। उदाहरण के तौर पर 2017-2018 चुनते हैं, तो अगला विकल्प राज्य का सामने आएगा।

State: (राज्य) आपको जिस राज्य के बारे में जानकारी चाहिए, उदाहरण के तौर पर जैसे हम राजस्थान राज्य के बारे में जानकारी चाहिए तो राजस्थान पर क्लिक करते हैं।

Plan Unit : इसके बाद आपको Plan Unit का विकल्प आता है, इसमें आपको ग्राम पंचायत, ब्लॉक और जिला पंचायत का विकल्प दिया जाता है, जिसमें आप अपना विकल्प चुन सकते हैं। उदाहरणस्वरूप हम ग्राम पंचायत चुनते हैं।

District Panchayat: (जिला पंचायत) इस विकल्प में आपको अपने जिला पंचायत के बारे में जानकारी देनी होगी। जैसे हमने चित्तौड़गढ़ के रूप में जानकारी चाहिए तो चित्तौड़गढ़ का चयन करें।

Block Panchayat:(क्षेत्र पंचायत) इसमें आपको ब्लॉक पंचायत के बारे में जानकारी देनी होगी। जैसे यदि हम आगे चित्तौड़गढ़ क्लिक करते हैं।

Village Panchayat: (ग्राम पंचायत) इसमें आप अपने गाँव की जानकारी देंगे, जैसे यदि द्योढ़ी विकल्प चुनते हैं तो वेबसाइट में यह तस्वीर आपके सामने होगी।

Get Report: (रिपोर्ट देखिए) सभी विकल्प पूरे भरने के बाद गेट रिपोर्ट में क्लिक करते ही आपके सामने पूरी पंचायत की रिपोर्ट सामने आ जाएगी। आप देख सकेंगे कि ग्राम पंचायत में किस कार्य के लिए कितना बजट पास किया गया। इतना ही नहीं, निर्माण कार्य की लागत का ब्यौरा दिया गया होता है। इस रिपोर्ट में कहां-कहां काम और क्या करवाया गया है, पूरी जानकारी आपको यहां मिलेगी। अगर वेबसाइट में काम किया गया है और जमीनी स्तर पर काम पूरा नहीं होता है तो आप जनसुनवाई में इसकी शिकायत कर सकते हैं।



ग्राम सभा के कामों लिए कैसे व्यवस्था की जाती है?


ग्राम सभा में पंचायत सचिव की भूमिका अति महत्वपूर्ण होती है। पंचायत सचिव की भूमिकाओं को मोटे तौर पर तीन वर्गों में बांटा जा सकता है: - 
(1) ग्राम सभा बैठक से पहले
(2) ग्राम सभा बैठक के दौरान
(3) ग्राम सभा बैठक के बाद

१- ग्राम सभा बैठक से पहले के कर्तव्य-

ग्राम सभा बैठक से पहले पंचायत सचिव के कर्तव्य हैं:- 

सरपंच के परामर्श से ग्राम सभा के एजेंडे को अंतिम रूप देना।
ग्राम सभा की बैठक की सूचना जारी करना।
ग्राम सभा बैठकों के विवरण, जैसे कि तारीख, समय और स्थल का व्यापक विज्ञापन देना।
ग्राम सभा की पिछली बैठक के प्रस्तावों पर की गई कार्यवाही की रिपोर्ट तैयार करना।
ग्राम सभा की मौजूदा बैठक से पहले एजेंडे की मदों पर नोट्स तैयार करना।
ग्राम सभा की बैठकों में भाग लेने वाले लोगों के लिए बैठने की व्यवस्था, पेयजल और स्वच्छता सुविधाओं का उचित प्रबंधन करना ।

२- ग्राम सभा बैठकों के दौरान के कर्तव्य-
ग्राम सभा बैठकों के दौरान पंचायत सचिव के कर्तव्यों में शामिल हैं:

ग्राम सभा की बैठक में भाग लेने वाले सदस्यों के विवरणों की रिकॉर्डिंग ।
ग्राम सभा की पिछली बैठक के प्रस्तावों पर की गई कार्यवाही की रिपोर्ट पेश करना।
एजेंडे के मुताबिक ग्राम सभा की बैठक का आयोजन सुनिश्चित करना।
ग्राम सभा की बैठकों की कार्यवाही का विवरण दर्ज करने में सरपंच की सहायता करना।
ग्राम सभा के समक्ष लाए गए किसी भी प्रस्ताव के पक्ष या विपक्ष में डाले गए वोटों को दर्ज करना।

३- ग्राम सभा बैठकों के बाद के कर्तव्य-

इनमें शामिल है- ग्राम पंचायत की बैठकों में ग्राम सभा के प्रस्तावों पर विचार के लिए सरपंच तथा वार्ड सदस्यों के साथ समन्वयन। ग्राम सभा की बैठक पर संबंधित उच्च अधिकारियों को रिपोर्ट भेजना ।

गाँव प्रधान कैसे बनें ?

ग्राम सभा 

किसी गांव के कुल व्यक्तियों की संख्या जिनका नाम वोटर लिस्ट में सम्मिलित हो | इन व्यक्तियों के समूह को ग्राम सभा कहा जाता है | एक ग्राम सभा में 200 या इससे अधिक व्यक्तियों का होना आवश्यक है ।

ग्राम प्रधान 

एक ग्राम सभा में एक अध्यक्ष का निर्वाचन किया जाता है, जिसे ग्राम प्रधान, सरपंच अथवा मुखिया के नाम से जाना जाता है ।

वेतन (Salary)

उत्तर प्रदेश राज्य में ग्राम प्रधान का वेतन 3500 रूपये है, इसके अतिरिक्त उन्हें यात्रा भत्ता एवं अन्य खर्चों के रूप में 15000 रूपये प्रति माह प्राप्त होते है |

ग्राम पंचायत का गठन व चुनाव

ग्राम सभा के कुल सदस्यों के द्वारा एक अध्यक्ष या प्रधान और अन्य सदस्यों को निर्वाचित किया जाता है, इन अध्यक्ष या प्रधान और अन्य सदस्यों को ग्राम पंचायत कहते है, इसका कार्यकाल 5 वर्ष होता है ।

चुनाव कैसे होता है (Election Kaise Hota Hai)

गावं में प्रत्येक पांच वर्ष के बाद ग्राम प्रधान का चुनाव कराया जाता है, राज्य सरकार के द्वारा इसके लिए निर्वाचन आयोग को स्वीकृति प्रदान की जाती है, इसके बाद निर्वाचन आयोग के द्वारा अधिसूचना जारी की जाती है, अधिसूचना जारी होते ही आचार संहिता को लागू कर दिया जाता है। अब जो व्यक्ति ग्राम प्रधान या सदस्य के पद पर चुनाव लड़ना चाहता है, उसको एक निर्धारित समय अवधि के अंदर पर्चा दाखिल या आवेदन पत्र को जिले के निर्वाचन अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करना होता है । इसके बाद निर्वाचन कार्यालय के द्वारा प्रत्येक आवेदन कर्ता को एक चुनाव चिन्ह प्रदान किया जाता है ।
अब सभी प्रत्याशी के द्वारा चुनाव प्रचार किया जाता है, यह चुनाव प्रचार निर्वाचन आयोग के  निर्देशानुसार किया जाता है । इसके बाद निर्धारित तिथि को मतदान कराया जाता है, मतदान के पश्चात मतगणना की जाती है, जिस प्रत्याशी को अधिक मत प्राप्त होते है, उसे ग्राम प्रधान पद पर निर्वाचित किया जाता है | निर्वाचित सदस्य को निर्वाचन अधिकारी के द्वारा प्रमाण पत्र प्रदान किया जाता है ।

ग्राम पंचायत को शपथ (Gram Panchayat Sapath)

चुनाव जीतने के बाद ग्राम प्रधान और सभी सदस्यों को पीठासीन अधिकारी या ग्राम पंचायत सचिव के द्वारा शपथ ग्रहण कराई जाती है ।

ग्राम प्रधान के अधिकार (Gram Pradhan Ke Adhikar)

  • उत्तर प्रदेश में पंचायती राज एक्ट के अनुसार विकास की कार्य योजना तैयार करने के लिए हर ग्राम पंचायत में 6 समितियां गठित की जाती है, इन समिति में प्रशासनिक कार्य समिति, नियोजन कार्य समिति, निर्माण कार्य समिति, जल प्रबंधन समिति, चिकित्सा स्वास्थ्य समिति, शिक्षा समिति है | परन्तु वास्तविक रूप इन सभी का कार्य ग्राम प्रधान के द्वारा कराया जाता है ।
  • एक ग्राम प्रधान के रूप में वह ग्रामसभा एवं ग्राम पंचायत की बैठक बुलाता है तथा इसकी कार्यवाही को नियंत्रित करता है ।
  • ग्राम पंचायतों के लिए सरकार द्वारा निर्धारित विकास योजनाओं, निर्माण कार्य व अन्य कार्यक्रमों की जानकारी रखना तथा सम्बंधित अधिकारियों से आवश्यक जानकारी लेकर ग्रामवासियों को बताना जिनसे वह इसका लाभ प्राप्त कर सके ।

गांव के लोग भी हटा (पदमुक्त कर) सकते हैं प्रधान को



ग्राम पंचायत के 1/3 सदस्य किसी भी समय हस्ताक्षर करके लिखित रूप से यदि बैठक बुलाने की मांग करते हैं, तो 15 दिनों के अंदर ग्राम प्रधान को बैठक आयोजित करनी होगी। ग्राम पंचायत के सदस्यों के द्वारा अपने में से एक उप प्रधान का निर्वाचन किया जाता है। यदि उप प्रधान का निर्वाचन नहीं किया जा सका हो तो नियत अधिकारी किसी सदस्य को उप प्रधान नामित कर सकता है।

 उपप्रधान को अगर पद से हटाना हो
सूचना प्राप्त होने के 30 दिन के अंदर जिला पंचायत राज अधिकारी गाँव में एक बैठक बुलाएगा जिसकी सूचना कम से कम 15 दिन पहले दी जाएगी। बैठक में उपस्थित तथा वोट देने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से प्रधान एवं उप प्रधान को पदमुक्त किया जा सकता है।
अगर ग्राम प्रधान या उप प्रधान गाँव की प्रगति के लिए ठीक से काम नहीं कर रहा है तो उसे पद से हटाया भी जा सकता है। समय से पहले पदमुक्त करने के लिए एक लिखित सूचना जिला पंचायत राज अधिकारी को दी जानी चाहिए, जिसमे ग्राम पंचायत के आधे सदस्यों के हस्ताक्षर होने ज़रूरी होते हैं। सूचना में पदमुक्त करने के सभी कारणों का उल्लेख होना चाहिए। हस्ताक्षर करने वाले ग्राम पंचायत सदस्यों में से तीन सदस्यों का जिला पंचायतीराज अधिकारी के सामने उपस्थित होना अनिवार्य होगा। सूचना प्राप्त होने के 30 दिन के अंदर जिला पंचायत राज अधिकारी गाँव में एक बैठक बुलाएगा जिसकी सूचना कम से कम 15 दिन पहले दी जाएगी। बैठक में उपस्थित तथा वोट देने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से प्रधान एवं उप प्रधान को पदमुक्त किया जा सकता है।



Monday, October 21, 2019

ग्राम पंचायत की जिम्मेदारियां को जानना हरएक ग्रामवासी का अधिकार है ।

ग्राम पंचायत और प्रधान के कामों को जानना हर वोटर व हर एक ग्रामवासियों का मूल अधिकार है ।
ऐसी बहुत सी योजनाएं हैं, जिनके बारे में न तो प्रधान ग्रामीणों को बताते हैं और न ही लोगों को इनके बारे में पता चलता है।

महात्मा गांधी ने कहा था कि "किसी भी देश का विकास तभी संभव है जब उसके गांव सशक्त हों और नागरिक जागरूक हों वो अपने अधिकार व कर्तव्यों को भली भांति समझें।"

 भारत में पंचायती राज के लिए गांवों का कायाकल्प करने  हेतु केंद्र और राज्य सरकार हर साल एक-एक ग्राम पंचायत को लाखों- करोड़ों रुपए देती हैं। इन पैसों से वहां शौचालय, नाली खडंजा, पानी, साफ सफाई, पक्के निर्माण होने चाहिए। गांव में सिंचाई की सुविधा हो ये भी प्रधान का काम है। 
उत्तर प्रदेश में कुल 59,163 ग्राम पंचायतें हैं, प्रदेश में 16 करोड़ लोग गांव में रहते हैं। 
'ग्रामीण भारत' की तरक्की के लिए सरकारें तमाम योजनाएं इन्हीं पंचायतों के जरिए चलाती है। ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव समेत कई अधिकारी मिलकर उस फंड को विकास कार्यों में खर्च करते हैं। अगर आप को जानकारी होगी तो आप न सिर्फ प्रधान से बैठक में पूछ पाएंगे, बल्कि आरटीआई के द्वारा सरकार से भी सवाल कर सकते हैं। ग्राम स्तर पर हर पंचायत के लिए ग्राम सभा से कोष का उपयोग करने हेतु एक प्रमाणपत्र पाना जरूरी होता है जिसके द्वारा ऐसी योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं का पंचायत द्वारा क्रियान्वयन किया जाता है।

मुख्य रूप से ग्राम पंचायत की होती हैं ये जिम्मेदारियां-

1- ग्राम पंचायत में जितनी भी कच्ची-पक्की सड़कों का निर्माण होता है, सभी ग्राम प्रधान को ही देखने होते हैं, साथ ही पानी निकासी के ड्रेनेज की भी व्यवस्था भी करनी होती है।
 2- गाँव में पशुओं के पीने के पानी की व्यवस्था करना ।
 3- पशु पालन व्यवसाय को बढ़ावा देना, पशुपालन के लिए जानकारी, उनका टीका और उनका उपचार कराना भी पंचायती राज्य के अंतर्गत रखा गया है ताकि पशुपालन ज्यादा फायदेमंद हो। दूध बिक्री केंद्र और डेयरी की व्यवस्था करना, गाँव में पशुओं के लिए चरागाह की व्यवस्था।
4- सिंचाई के साधन की व्यवस्था और बम्बों व नहरों से निकली नालियों की साफ-सफाई का काम भी ग्राम पंचायत को देखना होता है। स्वच्छता अभियान को आगे बढ़ाना, गाँव में सार्वजनिक शौचालय बनाना व उनका रख रखाव करना।
5- ग्रामीण क्षेत्र में नालियों की साफ-सफाई, गाँव में दवाइयों का छिड़काव, साथ एएनएम, आशा बहु टीका लगा रहीं हैं कि नहीं ये भी देखना होता है।
 6- ग्राम पंचायत के सार्वजनिक स्थान, जैसे मंदिर, मस्जिद आदि स्थानों पर लाइट की व्यवस्था करनी होती है, ताकि ऐसे स्थानों पर पर्याप्त उजाला रहे।
7- पंचायत में अलग-अलग धर्म व समुदाय के लोगों के लिए दाह संस्कार स्थल व कब्रिस्तान की देख रेख भी ग्राम पंचायत को करनी होती है। कब्रिस्तान की चारदिवारी का निर्माण भी ग्राम प्रधान को कराना होता है।
8- पंचायत को खेती व किसानी को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर कृषि गोष्ठी करानी होती है, ताकि किसानों को नई जानकारियां मिलती रहें।
दूसरा अगर कोई किसान कृषि क्षेत्र में नया प्रयोग करता है तो उसे प्रोत्साहित करना , जिससे दूसरे किसान भी उनसे जानकारी ले सकें।
9-गाँव में प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देना भी पंचायत के काम में ही आता है । गाँव में बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए, समय-समय पर जागरूकता रैली निकालने, घर-घर जाकर लोगों को शिक्षा का महत्व समझाना ताकि वो अपने बच्चों को विद्यालय भेजें। बेटियों को बढ़ावा देने के लिए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ स्कीम को आगे बढ़ाना । गरीब बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था
10- बच्चों के लिए खेल के मैदान का इंतजाम करना व खेल कूद से सम्बंधित सामान की व्यवस्था करना।
11- गाँव को हरा-भरा बनाने के लिए गाँव की सड़कों और सार्वजनिक स्थान पर पेड़ लगाना और दूसरों को प्रोत्साहित करना, साथ ही उसका उनका रख रखाव करना।
12- ग्राम पंचायत में जन्म मृत्यु विवाह आदि का रिकॉर्ड रखना, जिससे जनगणना जैसे कामों  आसानी आ जाए। इसके बारे में प्रशासन को समय-समय पर सूचित करना होता है।
13- ग्राम पंचायत स्तर पर बच्चों, किशोरियों व गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों की होती है, वो काम कर रही हैं कि नहीं, सभी को पोषाहार मिल रहा है कि नहीं ये सब देखने की जिम्मेदारी ग्राम प्रधान की होती है।
14- मनरेगा योजना के तहत तालाबों की खुदाई का काम भी ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी है। अगर किसी ग्रामीण क्षेत्र में नदियां हैं तो उनका संरक्षण भी ग्राम पंचायत के कार्यों में शामिल किया गया । राजकीय नलकूपों की मरम्मत व रख रखाव भी ।
15- समस्त प्रकार की पेंशन को स्वीकृत करने व वितरण का कार्य, समस्त प्रकार की छात्रवृत्तियों को स्वीकृति करने व वितरण का कार्य ।
16- राशन की दुकान का आवंटन व निरस्तीकरण, कोटेदार अगर नहीं दे रहा है राशन तो भी प्रधान से करें शिकायत।
17- गांव में किसी भी अपराध को रोकने के लिए ग्राम प्रधान को पहल करनी चाहिए, जैसे बाल विवाह, सांप्रदायिक दंगा, दहेज के लिए किसी जलाना, जमीन कब्जाना आदि इसमें ग्राम प्रधान की जिम्मदारी रहती है ।


👉ग्राम पंचायत की समितियां और उनके कार्य:- 

1. नियोजन एवं विकास समिति

सदस्य : सभापति, प्रधान, छह अन्य सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिला एवं पिछड़े वर्ग का एक-एक सदस्य अनिवार्य होता है।

समिति के कार्य: ग्राम पंचायत की योजना का निर्माण करना, कृषि, पशुपालन और ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रमों का संचालन करना।

2. निर्माण कार्य समिति
सदस्य: सभापति ग्राम पंचायत द्वारा नामित सदस्य, छह अन्य सदस्य (आरक्षण ऊपर की ही तरह) समिति के कार्य: समस्त निर्माण कार्य करना तथा गुणवत्ता निश्चित करना।

3. शिक्षा समिति
सदस्य: सभापति, उप-प्रधान, छह अन्य सदस्य, (आरक्षण उपर्युक्त की भांति) प्रधानाध्यापक सहयोजित, अभिवाहक-सहयोजित करना।

समिति के कार्य: प्राथमिक शिक्षा, उच्च प्राथमिक शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा तथा साक्षरता आदि सम्बंधी कार्यों को देखना।

4. प्रशासनिक समिति

सदस्य: सभापति-प्रधान, छह अन्य सदस्य आरक्षण (ऊपर की तरह)

समिति के कार्य: कमियों-खामियों को देखना।

5. स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति

सदस्य : सभापति ग्राम पंचायत द्वारा नामित सदस्य, छह अन्य सदस्य (आरक्षण ऊपर की तरह)

समिति के कार्य: चिकित्सा स्वास्थ्य, परिवार कल्याण सम्बंधी कार्य और समाज कल्याण योजनाओं का संचालन, अनुसूचित जाति-जनजाति तथा पिछड़े वर्ग की उन्नति एवं संरक्षण।

6. जल प्रबंधन समिति
सदस्य: सभापति ग्राम पंचायत द्वारा नामित, छह अन्य सदस्य (आरक्षण ऊपर की तरह) प्रत्येक राजकीय नलकूप के कमांड एरिया में से उपभोक्ता सहयोजित

समिति के कार्य : राजकीय नलकूपों का संचालन पेयजल सम्बंधी कार्य देखना।