Pages

Sunday, August 17, 2025

भरनाकलां गांव में अन्य गांवों से आए हुए स्वसमाज लोग ।

भोमिया/भूमिया शब्द का प्रयोग मुख्यत: उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, नेपाल और सिक्किम जैसे क्षेत्रों में कृषि, जंगल, जल स्त्रोतों और आजीविका के रक्षक के रूप में पूजने वाले देवता के लिए किया जाता है। यहां के लोग भूमिया देवता को एक लोक देवता, जागीरदार या भूमि-स्वामी के रूप में पूजते हैं। मान्यता है कि वे लोगों के पूजने से वे खुश होते हैं और मनोकामनाएं पूरी करते हैं। भूमिया देवता, को भूमियाल देवता या क्षेत्रपाल देवता भी कहा जाता है । 


वैसे भाषाई तौर पर भूमिया शब्द के कई अर्थ हैं- भूमि का अधिकारी, किसान, ज़मींदार, किसी देश का मूल और प्राचीन निवासी, बहुत पुराना साँप जिसके सर पर बाल निकल आते हैं, ग्राम-देवता ।

🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚

✍️एक ही गांव में, एक ही जाति के अंतर्गत ' दोहरी मानसिकता' स्वसमाज के लिए बिल्कुल भी हितकारी नहीं होती है । हमारी समूची जाति या सम्पूर्ण समाज के लोग अहिवासक्षेत्रसुनरख गांव (वृंदावन) के निवासी हैं। अहिवास क्षेत्र पर रहने कारण सभी सौभरेय ब्राह्मण, अहिवासी ब्राह्मण के नाम से जाने जाते हैं यह नाम क्षेत्रीयता को दर्शाता है वंश को नहीं, गोत्र और वंश के आधार पर स्वसमाज अंगिरस गोत्र (ब्रह्मर्षि सौभरि वंश) से संबंध रखता है। हमारे समाज के लोग समय और जरूरत के हिसाब से अन्यत्र सुगम/दुर्गम स्थानों पर बसते रहे हैं। शुरुआत में बसने का क्रम भी ज्यादातर गांवों में उपगोत्र /अवंटक/अल्ल के अनुसार ही रहा होगा जैसा कि देखने को मिलता है। इसका कारण कुछ भी रहा हो । इस हिसाब से जहां भी जिस गांव में बिरादरी के लोग बसे उन स्थानों पर या उसी गांव में उनको स्वसमाज का प्रथम प्रवासी माना गया जिसे लोग आम बोलचाल की भाषा में गामेंती या भूमिया भी बोल देते हैं । उसके बाद अन्य उपगोत्र/अल्ल के प्रवासी लोगों को उसी गांवों में पूर्व में रहे (भूमिया) लोगों के विसे पर (नाठ पर) या उनकी ज़मीन को खरीदकर बसते रहे, लेकिन यहां उनके लिए "गामेंती /भूमिया लोगों का रवैया" उनके प्रति दोयम दर्जे जैसा ही रहा है उनके जैसा नहीं जिन लोगों (बरगला गोत्र वाले परिवार) की जड़ जमीन पर आकर रहे । इसी से प्रथम प्रवासी (भूमिया/ गामेंती) और बाद में गांव में बसने वाले लोगों के बीच मान - सम्मान की वरीयता को लेकर कभी - कभार नोंक- झौंक भी हो जाती है। कभी-कभी तो भूमिया लोगों की हीन भावना इतनी सिर चढ़के बोलती है की उनको सड्ड-गड्ड या भजरउआ (किसी दूसरी जगह से आकर बसने वाले) कह के बुलाने लग जाते हैं। हालांकि ये भावना स्वसमाज़ सभी गांवों में होगी अथवा नहीं होगी। इसका अंदाजा नहीं है, ये भावना ज्यादातर उन्हीं गांवों में है जिन गांवों में पहले बसे लोगों (भूमिया/ गामेंतियों) की संख्या ज्यादा है। इसमें कसूरवार एक गांव या एक उपगोत्र/अल्ल के लोगों को नहीं ठहराया जा सकता, पूरा समाज जिम्मेदार है इस कृत्य के लिए । बहुत गांव ऐसे भी हैं जिनमें भूमिया लोगों की संख्या और शक्ति कम, वहां पर प्राय: ऐसा नहीं देखा जाता।

✓जरूरी नहीं कि ऐसे विचार सभी परिवारों के व्यक्तियों के है, लेकिन हैं कुछ न कुछ जरूर, ये वो असामाजिक तत्व  हैं जो दूसरों को उकसाने के लिए अथवा इस बात को ध्यान दिलाने के लिए हमेशा लालायित रहते हों। अन्ततः यूं कहें कि कुछ घर या कुछ व्यक्ति ही ज्यादा जिम्मेदार हैं । 

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ओल्ड इज गोल्ड, लेकिन ये भी सही बात है, सोने पे सुहागा(icing on the cake)

 मुहावरे का अर्थ- किसी अच्छी चीज में और भी अच्छी चीज का जुड़ जाना, जिससे वह और भी बेहतर हो जाए । जिस तरह सोना पहले से ही मूल्यवान होता है और सुहागा लगाकर उसकी चमक और बढ़ा दी जाती है ।

भावार्थ - ठीक वैसे ही अन्य के आने से गांव का रुतबा बढ़ा ही है कम नहीं हुआ। मतलब आप अच्छे हैं सम्माननीय हैं तो दूसरे भी हो सकते हैं और अक्सरकर होते भी हैं। इस सच को आप नकार नहीं सकते।

🟣हालांकि भूमिया बाबा (ग्राम्य देवता) सबके के लिए पूजनीय होता है और होना भी चाहिए । सर्वसमाज उन्हीं के स्थान और भूमि पर आश्रित है। गांव भरनाकलां में गामेंती लोगों की कई दशकों से 28 पाग हैं , हो सकता है जब किसी जमाने में बरगला उपगोत्र (सगोत्र अल्ल वाले) के लोगों के परिवारों की संख्या 28 रही होगी । ठीक इसी प्रकार कुछ वर्ष पहले समाज के अन्य सगोत्री लोगों (इटोंइया परिवारों) ने अपनी 36 पागों (कम या ज्यादा हो सकती हैं) की व्यवस्था कर ली है, शायद अब वो अपने आपको ज्यादा सम्मान की नजर से देखते हों लेकिन समाज के अन्य उपगोत्र(अल्ल) वालों का क्या? वैसे सम्पूर्ण स्वजाति एक ही पिता की संतान है । 'अल्ल/उपगोत्र'  में समाज को केवल विवाह आदि की वजह से अलग विभाजित किया गया है । इसमें कुछेक गामेंती लोगों का कहना है कि मान -सम्मान की यह भावना किसी एक विशेष ' उपगोत्र/अल्ल' को लेकर है न कि सभी अन्य उपगोत्र वालों के साथ, क्योंकि 2 - 3 पाग गामेंतियों के अलावा अन्य गोत्र वालों के पास भी हैं लेकिन वो पाग उन्हें उनसे मिली थी जिनके स्थान पर वो आकर रहे हैं पुराने स्थान वाले लोग बरगला गोत्र के ही थे । जैसे पचौरी, तगारे ।

👀उदाहरण 1- उदाहरण से समझिए, एक गांव का भूमिया/गामेंती स्वयं जब दूसरे गांव में जाकर किसी कारणवश बसता है वो भी सड्ड-गड्ड या भजरऊआ कहलाया जाता है। यह हानि किसी एक उपगोत्र वाले को नहीं हर उस परिवार को होती है जो उस गांव में जाकर नया- नया बसता है। इस चलन के अनुसार किसी गांव का ' भजरऊआ' अन्यत्र किसी गांव का "भूमिया/गामेंती" हो सकता है । जैसे - गांव पलसों में "परसइयां उपगोत्र", गांव सीह में "सीहइयां", गांव भरनाकलाँ में "बरगला", गांव मघेरा में "भुर्रक उपगोत्र" भूमिया या गामेंती कहलाते हैं लेकिन ये लोग किसी अन्य गांवों में जाकर रहें तो भजरऊआ कहलायेगा। जहां तक सम्मान की वरीयता की बात है, तो लोग इसका आंकलन इस हिसाब से करते हैं कि जब गांव में कोई भात, छोछक, लग्न आदि लेकर रिश्तेदार आते हैं तो अपने ही गांव के ही बड़े बुजुर्गों को चौक पे उस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए बुलाया जाता है तो कोशिश यह रहती है कि भात, छोछक, लग्न आदि में दी गई उस राशि अथवा सामान को पागधारी या भूमिया व्यक्ति ही ले । वैसे सम्मान और वरीयता का आधार ये होना चाहिए कि एन मौके पर कोई भी वह व्यक्ति जो उम्रदराज है या सम्माननीय है वही रिश्तेदारों के द्वारा दी गई राशि को ले । लेकिन भूमिया (बरगला गोत्र) द्वारा न लिए जाने पर आपत्तिजनक टिप्पणियां शुरू हो जाती है, कानाफूसी होने लगती है वैसे इसका अधिकारी, सर्वसम्मति से वह कोई भी बडा -बुजुर्ग हो सकता है चाहे किसी भी उपगोत्र का क्यों ना हो, पर सर्वसम्मति द्वारा ही व्यक्ति का चयन होना चाहिए । ऐसा कई बार देखा गया है या यूं कहें कि हर विवाह आदि के समय यह विषय चर्चा में आ ही जाता है।

👀उदाहरण 2- इसके अलावा दूसरा उदाहरण आप ऐसे समझिए कि अगर गांव के किसी भी एक थोक (क्षेत्र/सैक्टर)के परिवार से बारात किसी अन्य गांव में जाती है और वहां जो दान-दहेज लड़की वालों की ओर से मिलता है तो उस राशि या दहेज को कोई दूसरे थोक वाला  कोई बडा -बुजुर्ग ही लेता है । वहां भी संभावना यही जताई जाती है कि वो भूमिया ही हो । अगर ऐसा नहीं होता तो जिसकी विवाह कार्यक्रम में गए होते हैं उसको नाराजगी महसूस करवाते है । यह कितना सही है या गलत, नहीं पता। लेकिन ऐसा रिवाज सा बन गया है। हमें इस कूपमंडकता को अपने समाज के ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। वैसे स्वसामाजिक उपगोत्र जैसे - विश्दैला पचौरी, कुम्हेरिया आदि हर गांव में मिल ही जाते हैं । इसका मतलब उनको अपने गांव के अलावा प्रत्येक गांव में इस प्रताड़ना का दंश झेलना पड़ेगा?

👁️ साधारणतया भेदभाव की भावना समाज को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट देती है।  उसी के अनुसार ही लोग आपस में बातचीत और समन्वय स्थापित करते हैं। भेदभाव के कारण जो लोग निर्दोष होते हैं वो लोग या परिवार भी शत्रुओं के समान प्रतीत होते हैं। समाज में आपसी भेदभाव के कारण भय, संदेह और अविश्वास बना रहता है। इस के कारण आपसी तालमेल तो नष्ट होता ही होता है और उसी के साथ-साथ लोगों के बीच भी एक घृणा की पक्की दीवार भी खड़ी हो जाती है। महापुरुष अथवा सज्जन लोग हमेंशा से ही कहते आए हैं कि, "भेदभाव" एक व्यक्ति, समूह या संस्था को एक अलग और हानिकारक तरीके से व्यवहार करने के बारे में बोध कराता है । यह विभिन्न कारणों से हो सकता है, दौड़, लिंग, विचार, उत्पत्ति का स्थान, शारीरिक उपस्थिति आदि। लोगों को एकता व समानता के भाव से रहना चाहिए भेदभाव की इस भावना को नष्ट होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। ऐसे विघटनकारी मानसिकता से किसी का भला होने वाला नहीं है। व्यतिगत भावना या उपगोत्र की भावना से "सामाजिक भावना" सर्वोपरि है। वैसे इस आधुनिक युग में बराबरी के आधार पर सभी के साथ व्यवहार करने में ही भलाई है और बुद्धिमानी भी । भेदभाव से हीनभावना को बढ़ावा मिलता है। 

👉 All human beings are born free and equal in dignity and rights. We are all one.

🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚

🔮गांव भरनाकलां में सौभरेय अहिवासी ब्राह्मणों के उपगोत्रों (अवंटक/ अल्ल आदि) के अनुसार लोगों की बसावट वर्ष का अनुमान... जैसे कि किस उपगोत्र के लोग गांव भरनाकलां में कौनसे वर्ष में बसने के लिए गांव में आए। भरनाकलां गांव पहले गांव भरनाखुर्द की ओर सड़क पार बसा हुआ था लेकिन वर्तमान में गांव जिस स्थान पर बसा हुआ है उस जगह पर बसावट नई(नवीन )है।स्वसमाज के अतिरिक्त गांव में पहले से ही कुम्हार, गड़रिया, भंगी, जाटव, नाई, धीमर, दर्जी आदि भी रहते थे । गांव में सबसे पुरानी बस्ती का हिस्सा होने के कारण वो भी अक्सरकर अपने आप को भूमिया कहकर संबोधित करते हैं । ऐसा कहा जाता है कि इस गांव में कोई कल्हार नामक जाति रहती थी।

स्वसमाज के घरों की संख्या और गांव में आने का वर्ष:- 

1-नुक़्ते(बरगला) - 1700 ईस्वी (औरंगजेब शासन के आसपास)

 

2- भुर्रक -

A- पटवारी परिवार (सन  १९३५)

B - गैया बाबा परिवार (सन १९२५ वर्ष पूर्व)

C - सलैमपुरिया परिवार (१९६४)


3-तगारे 

A - सट्ठा परिवार 

B - जयप्रकाश पंडा जी

C - होती मास्टर जी

 4-पचौरी

A - नीम वाले 

B - भाई बाबा 

C- रग्गो दादा

D - यादराम बाबा/राधेश्याम बाबा

 5- कुम्हेरिया

A रघुवीर भगत जी/शिवचरण मासाहब/जतिया/रामकृष्ण)

(सन १९४०)


6-सिकरोरिया 

A- रघुनाथ पंडित जी

7-परसईंयां (सन १९६०)

हरिया बाबा 

 8-बजरावत (सन १९५०)

दाऊजी निमासौ 

9- रमैया (सन २०१०)

पूरन चेंटा जी 

10-दीगिया 

11-कांकर

कन्ना बाबा (१९५०)

12-  इटोंईयां

13- प्रधान(पधान)

राधे जी

14- नायक


🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚

    ॐ नम: शिवाय।। राधेकृष्ण ।। जय श्री राम ।


संबंधित लिंक...





No comments:

Post a Comment