Pages

Monday, February 17, 2025

गांव भरनाकलां में मंदिर अथवा देवस्थानों की संख्या

 मेरा गांव मेरा गर्व- 

गांव के मंदिर गांव की अमूल्य धरोहर- भरनाकलां गांव में सामाजिक और निजी दोनों प्रकार के मंदिर हैं, जब में सामाजिक होने की बात कर रहा हूं तो सर्वसमाज के द्वारा हस्तक्षेप का अधिकार और कर्तव्य की बात है और जब निजता की बात कर रहा हूं तो समाज के द्वारा हस्तक्षेप का अधिकार नहीं होने की बात है लेकिन दर्शनार्थ के लिए सबजनों के लिए मंदिरों द्वार खुले हुए हैं ।

गांव के सभी मंदिरों का विवरण इस प्रकार है: - 



1- गांव भरनाकलां में "ठाकुर श्री बिहारी जी महाराज" मंदिर सबसे भव्य व बृहद है। लगभग 500 वर्ष पुरातन श्री बिहारी जी मंदिर का निर्माण भरनाकलां ग्राम वासियों द्वारा करवाया गया था। मंदिर पुराने होने के सबसे बड़ा साक्ष्य मंदिर के जगा (पुराने समय में बहीखाते में सूचना एकत्रित करने वाले लोग) हैं । वो अलवर राजस्थान से आते थे । यह रामानंदी संप्रदाय का अनुसरण करते हुए सभी अन्य संप्रदाय अथवा यूं कहें कि सनातन धर्म की way of life को मानता है ।  मंदिर में श्री बिहारी जी महाराज विराजमान हैं उनके मूर्ति स्वरूप को उनके निजधाम वृन्दावन से लाया गया था, हाल ही में मंदिर का पुनर्निर्माण "मंदिर कमेटी" की देखरेख में कराया गया है। सम्पूर्ण ठाकुर द्वारे का जीर्णोद्धार किया गया है । वर्तमान में लॉकडाउन के समय मंदिर के चारों ओर नई बाउंड्री वॉल बनाई गई है । मंदिर का सारा खर्चा मंदिर की खेतीहर भूमि से प्राप्त पट्टे की राशि से मंदिर कमेटी द्वारा  उठाया गया है । मंदिर के लिए एक ट्रस्ट बनाने के प्रस्ताव पर बातचीत जारी है । उसके 40 सदस्यों को चिन्हित कर लिया जाएगा । कोषाध्यक्ष व प्रधान प्रबंधक का चयन किया जा जाना बाकी है ।

वास्तुकला - श्री बांके बिहारी जी का मंदिर बहुत ही सुन्दर सफेद और श्याम संगमरमर से बना हुआ है। मन्दिर का प्रवेश द्वार बहुत ही आकर्षक और शानदार है। मंदिर में 2 दिशाओं में ठाकुर जी विराजमान हैं मुख्य द्वार में प्रवेश करने के बाद, एक आयताकार आँगन है ठीक सामने ही ठाकुरजी का दरबार है और और बाएं हाथ की तरफ काली माता का दरबार है ।  मंदिर के आँगन में तुलसी का थंबूला है । मन्दिर में पूजास्थल के  बाहर मंदिर प्रांगण में  महंतों के पदचिन्ह भी हैं। मंदिर के बाहरी और आंतरिक दीवारों को मंदिर के आकर्षण और प्रभाव के लिए सुंदर नक्काशियों और चित्रों से सजाया गया है। ठाकुरद्वार के दांयी ओर ब्रह्मर्षि सौभरि जी की मूर्ति विराजमान है ।

इस मंदिर के पुनर्निर्माण में अनेक महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखा गया है। सर्वप्रथम इसकी भव्यता को ही आधार बनाकर मंदिर को विशाल रूप में निर्मित किया गया है जिसमें उसका ' शिल्प सौंदर्य' सभी को प्रभावित करता है।

कृषिभूमि:-  बिहारी जी के नाम 25 बीघा जमीन है । 21 बीघा भूमि लीडो बम्बी पर स्थित है और 4 बीघा भूमि गांव के समीप मंदिर के सामने । सिंचाई के लिए दोनों जगह भरतपुर फीडर बम्बे से पाइप लाइन की उचित व्यवस्था है ।

मंदिर महंत:- वर्तमान में मंदिर पर महंत भी हैं कुछ दिन पहले तक मंदिर श्री नंदराम बाबा थे । इनसे पहले श्री गोविंद दास बाबा मंदिर के महंत हुआ करते थे उनके देहांत के बाद श्री नंदराम बाबा को उनका उत्तराधिकारी बनाया गया था । मंदिर के महंतों की सूची इस प्रकार है- सेवादास बाबा, मौनी बाबा, बालकदास । इनसे पहले भी जो मंदिर महंत हुए हैं उनकी समाधियां मन्दिर केे दाहिने भाग की ओर बनी हुई हैं ।

 पहले मन्दिर की खेती को आधे-बांटे पर दिया जाता था । उस समय मन्दिर में दूध के लिए कुछ गाय-भैंसों को भी रखा जाता था। उनकी सेवा के लिए एक विशेष सेवादार भी हुआ करता था । मंदिर की भूमि से आने वाली कमाई को कुछ साल तक महंत बालकदास ने अपने कब्जे में रखा वो एक-आध बार गाँव आते थे , गांव वालों ने विरोध जताकर उनसे महंत की गद्दी छीन ली और अन्य को महंत बना दिया । वैसे महंत सौभरि ब्राह्मण समाज से ही रहे हैं केवल बालकनाथ बाबा इस परंपरा का अपवाद हैं । महंत 4 बजे प्रातः शंख बजाकर ठाकुर जी को निंद्रा से उठाते हैं । औऱ लोगों द्वारा मनाये जाने वाले व्रत त्यौहार की सूचना जांरी करते हुए महंत माइक में आवाज लगाते हैं । फिर 5 बजे ठाकुर जी की आरती होती है ।

शिशु मंदिर:- मंदिर प्रांगण में ही श्री बिहारी जी महाराज शिशु मंदिर बना हुआ था, उसमें बहुत दिनों तक पठन- पाठन हुआ, यह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा मान्यता प्राप्त स्कूल था, यहाँ बच्चों की शाखा लगवाई जाती थी, स्कूल की पढ़ाई की शुरुआत सदाचार की प्रथम वेला से होती थी, 26 जनवरी व 15 अगस्त को बालकों के कार्यक्रम का मंचन होता था, RSS शिक्षा आयोग फरह, मथुरा से आचार्यों की नियुक्ति की जाती थी लेकिन अब उसको भी तुड़वाकर इसी वर्ष 2020 में मंदिर की बाउंड्री वॉल के अंदर ले लिया गया था । कक्षा आठवीं तक चलने वाले स्कूल में कभी प्रतियोगिताओं का दौर हुआ करता था, बाहर के स्कूलों के बच्चे आया करते थे । स्कूल में आसपास के गाँवों के बच्चे भी आया करते थे । महंत जी द्वारा मंदिर के पीछे मुहारवन में अच्छे हरे - भरे पेड़ - पौधे लगाए गए थे जो कि हमारे पर्यावरण को संतुलित रखने में बड़े ही सहायक हैं।

अभी स्कूल वाली जगह पर ग्राम पंचायत भवन का निर्माण कराया गया है और इसके बराबर में एक अस्पताल का निर्माण भी कराया गया है।

गौशाला - अभी बनना बाकी है ।

सामाजिक पुस्तकालय - अभी बनना बाकी है ।

🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱

2- राधा-कृष्ण  मंदिर (छोटा मंदिर), सवा विसा ।

श्री राधाकृष्ण मंदिर (छोटा मंदिर) सवा विसा में नधा तालाब के समीप स्थित है । वास्तु के हिसाब से इसका प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में है जो कि बहुत ही शुभ माना जाता है । मन्दिर के मुख्य दरबार में विराजमान श्री राधा कृष्ण जी है । मंदिर में स्थित बहुत ही भव्य व मनमोहक मुर्तियां जो लोगों का मन मोह लेती हैं । मंदिर के पास 12 बीघा भूमि है जिसके मालिक स्वयं प्रेमी युगल स्वरूप श्री राधाकृष्ण जी ही हैं । मंदिर की खेतीहर भूमि को कृषि के लिए वार्षिक पट्टे पे उठाया जाता है ।



मंदिर का निर्माण सवा विसा भरनाकलां के लोगों ने ही मिलकर किया था। अब से कुछेक वर्ष पहले ही मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया है जिसमें सम्पूर्ण मंदिर में ग्रेनाइट पत्थर का प्रयोग गया है । मंदिर के द्वार पर भव्य स्वागत करती मुर्तियां लगाई गई हैं । यह मंदिर ग्राम की परिक्रमा में पड़ता है । ग्रामवासी जब गॉंव की परिक्रमा करते हैं तो अवश्य ही इस मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं । मंदिर प्रांगण में मंदिर कमेटी द्वारा वार्षिक 'श्रीमद भागवत कथा' का आयोजन होता है । सवा विसे में स्थित श्री राधाकृष्ण मंदिर (छोटा मंदिर) के महंत श्री उड़िया बाबा जिनका हाल ही में मुक्तिधाम को चले गए हैं जो लगभग 50 वर्षों से मंदिर के मुख्य पुजारी थे । युवावस्था से ही वो ग्राम भरनाकलां में रहे, अन्यत्र कहीं नहीं गए । वो नाटे कद के थे और वो ऐसी विद्या जानते थे लोग किसी वस्तु की चोरी या खो जाने पर *पूछा  वाले* के पास जाते थे, लेकिन उड़िया बाबा इस मसले का हल मंदिर से बैठे-बैठे ही कर देते थे वो बता देते थे कि फल चीज वहाँ मिल जाएगी या इतने दिनों के बाद मिल जाएगी ।

 3- ब्रह्मर्षि सौभरि आश्रम (प्याऊ वाली धर्मशाला) दश विसा 


भरनाकलां में दश विसा की जनता (गांव के तीन थोकों/सेक्टर्स में से एक) द्वारा प्याऊ (प्राचीन नाम) सौभरि धर्मशाला का पुनर्निमाण ११००० रूपये प्रति घर के हिसाब से एकत्रित कर करवाया, उस समय १०० घरों से धन इकठ्ठा किया गया था, वैसे गांव  में स्वसमाज के २०० से अधिक घर हैं । लगभग १०० घर सवा विसा और ढाई विसा में हैं। पुनर्निमाण से पहले यहां प्रवेश द्वार पर एक प्याऊ हुआ करती थी और वर्तमान में उसी जगह पर एक पानी टंकी लगवाई गई है जहां से राहगीर पानी पिया करते हैं। वर्तमान में धर्मशाला के प्रवेश द्वार पर दाहिनी ओर श्री हनुमान जी विराजमान हैं। और बराबर में शिवलिंग (शिव परिवार) । फिर धर्मशाला का प्रांगण है जिसमें प्रत्येक वर्ष रामायण अथवा श्रीमद् भागवत कथा का वाचन होता है। यह कार्यक्रम श्रावण मास के महीने में अथवा होली, फाल्गुन मास के महीने में के आसपास होता है। वर्तमान में यहां के महंत श्री शिवम् शास्त्री जी हैं जो नित्य श्री ठाकुर जी की सेवा करते हैं। वह कई वर्षों से इस पद पर कार्यरत हैं। श्री महंत आसाम राज्य के निवासी हैं लेकिन ब्रज और ब्रजजन में अनंत विश्वास रखते हैं। गांव के हर कार्यक्रम में उनको बुलाया जाता है।

पहले इस धर्मशाला को तिवारी के नाम से इस जगह पुकारा जाता था। यहां एक छोटा सा महादेव मंदिर था जहां लोग सुबह प्रांगण में बनी खारी कुइआ पर नहाते थे, यहां एक बरामदा उसके पीछे एक बड़ा सा हॉल हुआ करता था  और उसके अंदर एक छोटी कोठरी थी, कोठरी में अंधेरा रहने की वजह से कोई नहीं जाता था। पहले सुबह- सुबह अधिकतर लोग यही नहाने आया करते थे, दंड - बैठक लगाते थे । वर्तमान प्रांगण में पेड़ -पौधे लगाए गए हैं। आंगन में पीछे की ओर बरामदा और कमरे बनाए गए हैं जिसमें एक कमरा भगवान जी के लिए और दूसरा कमरा सेवादार के लिए बनवाया गया है। बरामदे व कमरे में ग्रेनाइट व टाइल्स लगाए गए हैं।

4- हनुमान मंदिर, समोखरी

5- तीनों ग्राम्य देवियां - ग्राम्य देवियां पथवारी मैया, चावड मैया, शैडो मैया।

 i- पथवारी मैया:- भरनाकलां स्थित सवा विसा में विराजमान "पथवारी मैया" ।



ii- चावड मैया:- भरनाकलां स्थित ढाई विसा में विराजमान "चावड मैया" ।



  iii- शैडो मैया:- भरनाकलां स्थित दश विसा में विराजमान "शैडो मैया" ।

 🔸मीठी कुइआ के  पास स्थित मंदिर, दश विसा

 🔸स्कूलफॉर्म के सामने वाला शिव मंदिर, दश विसा 

🔸महादेव मंदिर, दश विसा

 इसके अतिरिक्त बहुत से ऐसे मंदिर हैं जो खेत खलियानों में बाग- बगीची अथवा कोठरियों के पास बने हैं।

🌏🌏🌏🌏🌏🌏🌏🌏🌏🌏🌏🌏🌏🌏🌏

क्यों है मंदिरों का महत्व:-

 मंदिरों का हमारे जीवन में महत्व बहुत ही बड़ा है । मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन करने से मन को शांति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है. मंदिरों में पूजा-पाठ करने से भक्तों को मानसिक, शारीरिक, और आत्मिक रूप से मज़बूती मिलती है । मंदिर, धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष की प्राप्ति का साधन माने जाते हैं । हालांकि जप-तप और ध्यान के लिए एकांत बहुत जरूरी है। ऐसे में पर्वतों को भी देवी-देवताओं के निवास के लिए उपयुक्त माना गया हैं, मंदिर पूजा का वह स्थान है जिसका उपयोग आध्यात्मिक अनुष्ठानों और प्रार्थना और परंपराओं का अनुपालन जैसी गतिविधियों के लिए किया जाता है । यह अराधना और पूजा-अर्चना के लिए निश्चित की हुई जगह या देवस्थान है। यानी जिस जगह किसी आराध्य देव के प्रति ध्यान या चिन्तन किया जाए या वहां मूर्ति इत्यादि रखकर पूजा-अर्चना की जाए उसे मन्दिर कहते हैं। मन्दिर का शाब्दिक अर्थ 'घर' है।

मंदिरों में शंख, घंटे, और मंत्रों की ध्वनि से एक खास आवृत्ति बनती है। मंदिर किसी के मन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं और अक्सर उन्हें आशा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। कई हिंदुओं के लिए, मंदिर मुश्किल समय के दौरान शरण का स्थान है।

 ध्वनि, प्रकाश, वायु आदि सभी मे तरंगें होती हैं। कोई भी तरंग सीधी रेखा में नही चलती सभी की अपनी आवृति होती है। विस्फोट होता है। ये जितनी अधिक शक्तिशाली होगी उसका उतना ही अधिक क्रिया क्षमता पर असर पड़ेगा। मन्दिरों में शंख, घण्टे और मन्त्रों की ध्वनि में एक विशेष आवृति बनती है। वह दैवीय ऊर्जा होती है जो हमें मानसिक शारीरिक और आत्मिक रूप से दृढ़ बनाती है।

हमारे देश में प्राचीन मंदिर धरती के धनात्मक यानी पॉजिटिव ऊर्जा केंद्रों पर बनाये गए हैं। ये मंदिर आकाशीय ऊर्जा के ग्रिड हैं। भक्त मंदिर में नंगे पैर होता है। इससे उसके शरीर में अर्थ प्रवाहित होने लगता है। जब हाथ जोड़ता है तो शरीर का ऊर्जा चक्र चलने लगता है। देव प्रतिमा के आगे सिर झुकाता है तो प्रतिमा से परावर्तित होने वाली पृथ्वी व आकाशीय तरंगे मस्तक पर पड़ती हैं और मस्तक पर स्थित आज्ञा चक्र पर प्रभाव डालती है। जिससे सकरात्मक विचार आते हैं। भक्त अपने अंदर एक विशेष ऊर्जा और हल्केपन तथा शांति का अनुभव करने लगता है।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

भारत में कुल 6,48,907 मंदिर है । देश के दक्षिणक्षेत्र में सबसे ज्यादा संख्या में मंदिर हैं, जहां तमिलनाडु सबसे ऊपर हैं । अंकोरवाट ( कम्बोडिया) मन्दिर परिसर और दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक है, 162.6 हेक्टेयर (1,626,000 वर्ग मीटर; 402 एकड़) को मापने वाले एक साइट पर। यह कम्बोडिया के अंकोर में है जिसका पुराना नाम 'यशोधरपुर' था।

अभी सक्रिय धर्मों/संप्रदायों /पंथों में मंदिरों को किस नाम से जाना जाता है :- 

हिंदू धर्म - मंदिर 

बौद्ध धर्म - विहार 

सिख धर्म - गुरुद्वारा

जैन धर्म - देरासर 

पारसी धर्म - अगियारी

बहाई धर्म - उपासना गृह , ताओवाद - दाओगुआन 

शिंटो - जिंजा

 कन्फ्यूशीवाद - कन्फ्यूशियस

 क्रिश्चियन - चर्च

इस्लाम - मस्जिद 

यहूदी - सिनागॉग

अन्य नाम - हिंदू मंदिरों को क्षेत्र और भाषा के आधार पर कई अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जिनमें अलायम, मंदिर , मंदिरा , अम्बलम , गुड़ी , कावु , कोइल , कोविल , देउल , राउल , देवस्थान , देवालय , देवायतन , देवकुला , देवगिरिहा , देगुल शामिल हैं। , देव मंदिरया , और देवालयम । 

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

हिंदू मंदिरों की वास्तुकला का प्रकार:- हिंदू मंदिर वास्तुकला मुख्य रूप से दक्षिण की द्रविड़ शैली और उत्तर की नागर शैली, अन्य क्षेत्रीय शैलियों में विभाजित है। मंदिरों में वास्तु के मुताबिक निर्माण किया जाता है ।

 भारत में मंदिर मुख्य रूप से तीन शैलियों में बंटे होते हैं: नागर शैली, द्रविड़ शैली, बेसर शैली. 

नागर शैली के मंदिर उत्तर भारत में, द्रविड़ शैली के मंदिर दक्षिण भारत में, और बेसर शैली के मंदिर विंध्याचल पर्वत से लेकर कृष्णा नदी तक पाए जाते हैं । नागर और द्रविड़ शैलियों के मिश्रण को बेसर शैली कहते हैं. बेसर शैली को चालुक्य शैली भी कहा जाता है ।

 हिन्दू मंदिर में अन्दर एक गर्भगृह होता है जिसमें मुख्य देवता की मूर्ति स्थापित होती है। गर्भगृह के ऊपर टॉवर-नुमा रचना होती है जिसे शिखर (या, विमान) कहते हैं। मन्दिर के गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा के लिये स्थान होता है। इसके अलावा मंदिर में सभा के लिये कक्ष हो सकता है।


ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा

संबंधित लिंक...

No comments:

Post a Comment