(आदर्श गांव/मॉडल गांव भरनाकलां)
गांव भरनाकलां का इतिहास ।
गांव भरनाकलां के सामाजिक स्थल ।
गांव भरनाकलां के देव मंदिर ।
गांव भरनाकलां के कुआं व कुइआ ।
गांव भरनाकलां के अस्पताल ।
गांव भरनाकलां के तालाब ।
गांव भरनाकलां के पर्व और मेले ।
गांव भरनाकलां में पागों की संख्या ।
गांव भरनाकलां की ग्राम्य देवियां ।
गांव भरनाकलां के स्कूल और कॉलेज ।
गांव भरनाकलां की धर्मशाला ।
गांव भरनाकलां का ग्राम पंचायत भवन ।
गांव भरनाकलां गांव की परिक्रमा ।
गांव भरनाकलां में सेंट्रल बैंक सुविधा ।
गांव भरनाकलां में शहीदस्थल ।
गांव भरनाकलां के वार्ड, ग्रामसभा सदस्य संख्या
गांव भरनाकलां में सुविधाएं कैसी हों?
गांव भरनाकलां में पुस्तकालय और संग्रहालय ।
अपना गांव भरनाकलां, ब्लॉग संख्या - १
🌅तालाब/सरोवर हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। भरनाकलां गांव की चारों दिशाओं में प्रमुख ४ सरोवर हैं इसके पूर्व में श्यामकुण्ड, पश्चिम में नधा, दक्षिण में मुहारी(मुहारवन) एवं उत्तर में समोंखरी(छोटा तालाब) है । गांव के चारों तालाबों में से किसी की भी अभी बाउंड्रीवॉल द्वारा घेराबंदी नहीं हुई है। अभी सभी तालाबों की कच्ची मेड़ों के माध्यम से सीमा निर्धारित है। गांव भरनाकलां के चारों तरफ इस तरह का जलीय भराव प्राकृतिक सौंदर्य व अच्छे से जल के प्रबंध को दर्शाता है। ये सब हमारे गांव के पूर्वजों की मेहनत का नतीजा है इसलिए हम उनका और सौंदर्यीकरण कर के सरकार और ग्रामवासियों की सहायता से और ज़्यादा खूबसूरत बना सकते हैं जैसे उचित ताजा पानी भरने के लिए बोरवैल और गंदी नालियों के जल प्रवाह को रोक कर जो इन सभी तालाबों में ग्रामवासियों के घर से बहता हुआ जो गिरता है। पक्की चारदीवारी कर के उनके चारों ओर अच्छे पेड़- पौधे लगाकर साथ ही सरोवर के चारों तरफ परिक्रमा मार्ग बनाकर जिससे ग्रामवासी सुबह- टहल सकें वहां अगर बैठने का भी उचित प्रबंध हो तो सोने पे सुहागे जैसा होगा, ताकि सभी लोग इस विरासत का लाभ उठा सकें।
ग्राम के चारों सरोवर इस प्रकार से हैं -
१-*मुहारी कुंड*- ठाकुर बिहारी जी महाराज मन्दिर के पास स्थित तालाब को मुहारी के नाम से जाना जाता है । इसमें जल भरने की व्यवस्था भरतपुर फीडर (बम्बे) के जल से नाले द्वारा की जाती है । कुंड के किनारे दो बड़े घाट बने हुए हैं जोकि ठाकुर बिहारी जी महाराज मंदिर की तरफ हैं। कभी इसी कुंड में सभी गांव वाले लोग अपने पशुओं को जल पिलाने यहीं लाया करते थे । कार्तिक मास में नहाने वाले भक्त एक महीने तक इसी कुण्ड में 4 बजे भोर काल में गोता लगाते थे । लेकिन अब कोई नहीं नहाता, सिर्फ 4-6 पालतू बतखों के अतिरिक्त । कुछ भक्त लोग गांव की परिक्रमा देते वक्त तालाब की मछलियों के लिए आटे की गोलियां या चावल के दाने हर रोज आया करते हैं । सरोवर के किनारे ग्रामवासियों के पूर्वज देवतारूप में जिन्हें थान बाबा (देवस्थल/पूर्वजस्थल)के नाम से पुकारा जाता है, वो बने हुए हैं । यह गांव के ढाई विसा क्षेत्र की भूमि पर स्थित है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह सबसे बड़ा (लगभग ४ एकड़)और सुंदरता की दृष्टि से सबसे सुन्दर सरोवर है।
२- *श्यामकुंड*- श्यामकुंड में पुराने घाट भी हैं जो कि शैडो मैया (ग्राम्य देवी) के मंदिर वाली दिशा में हैं जो कि बघेल समाज की बसावट के पीछे की दिशा की ओर हैं । वर्तमान में भौगोलिक स्वरूप तो श्यामकुंड का है लेकिन कागजी भूखंड न होने की वजह से विलुप्ति की कगार पर है । लेकिन सभी गांव के लोगों द्वारा स्वैच्छिक रूप से इसकी स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए ताकि इसके पुराने स्वरुपानुसार इसका विकास किया जाए। क्यूंकि इससे प्रकृति के अनुरूप इको सिस्टम बना रहता है साथ ही कही ना कही और कभी ना कभी आग लगने के समय भी इसके जल का उपयोग कर लिया जाता है। इसके अतिरिक्त गांव में जब कभी नए मकान बनवाए जाते हैं तो ग्रामवासी गारे व तड़ाई के लिए भी इस श्यामकुंड के पानी का प्रयोग करते ही हैं, पशुओं के लिए भी कभीकभार प्रयोग में ले ही लिया जाता है। यह गांव के "दश विसा क्षेत्र" में स्थित है। यह तालाब चारों तालाबों में से इकलौता ऐसा है जिसके किनारे पर स्थित मंदिर इसकी सीमा से बाहर हो गया है। बाकी सभी तालाबों के किनारे अभी सभी मंदिर विद्यमान हैं।
३- *नधा*- गांव के छोटे मंदिर "श्री राधाकृष्ण मंदिर" के पीछे वाले तालाब को नधा के नाम से जाना जाता है। इस तालाब की एक बार सफ़ाई हुई तो इसी के माध्यम से इस सरोवर की सीमाओं का निर्धारण किया गया था। इसमें बारिश के पानी का ही संचय होता है। अलग से पानी भरने की व्यवस्थाएं नहीं हैं। ये गांव के तीनों विसे (दश विसा, सवा विसा, ढाई विसा ) में से, ढाई विसा में स्थित है।
४- *समोखरी* - यह तालाब गांव के उत्तरी छोर पर स्थित है यह गांव के किनारे स्कूल फॉर्म की भूमि के किनारे पर है, गांव में थोक सीमा के अनुसार दश विसे में आता है। इसकी कभी साफ़ सफ़ाई नहीं हो पाती इसलिए इसमें जलकुंभी से पटा रहता है, आकार की दृष्टि से भी यह तालाब गांव के अन्य तालाब से काफी छोटा है। तालाब के किनारे ही हनुमान जी का मंदिर भी है।
जल ही जीवन है, जल को बचा लेना जैसे भावी जीवन को बचा लेना है। अक्सर गर्मी बढऩे के साथ ही जल की जरूरत महसूस की जाती है। देश में तालाबों की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अधिकांश प्राचीन मन्दिर तालाबों के किनारे ही विद्यमान हैं। तालाब पर पूरे देश के अंचलों में पारंपरिक लोक गीतों का प्रचलन है। गांवों में तालाबों की अपनी गरिमा है, तभी तो इसे जलाशय, ताल तलैय्या, गहड़ी, पोखर, चेवर, आहर, हौजी हौदा, सागरा, तरिया, झील और बावड़ी के नाम से अलग-अलग प्रदेशों में जाना जाता है।
जीवन में धर्म- कर्म और व्यवहार का वास्तविक दर्शन करना हो तो तालाब के किनारे जाकर महसूस कीजिए। नदी, तालाब एवं सागर से होकर गुजरने वाली हवायें बेहतर स्वास्थ्य के लिये आयुर्विज्ञान हैं। तालाब के किनारे पेड़ के नीचे बैठना, नदी अथवा सागर के किनारे खड़ा होना, लहरों के अठखेलियों को देखना, जलधार में उतरकर इसके आनन्द को महसूस करना तो निजी अनुभूति की बात है। समय के साथ लोग बदले इसके साथ ही लोगों के सोच में भी परिवर्तन हुये । इस परिवर्तन ने नकारात्मक बदलाव का रूप ले लिया उसी का नतीजा है कि आज तब के तालाब भी तब जैसे नहीं रहे । चूंकि तालाब हमारे सांस्कृतिक धरोहर के साधन हैं, डर है कि हमारी उदासीनता के चलते कहीं यह भी विलुप्त न हो जायें। इससे पहले कि हमारे सोच से तालाबों की बेदखली हो हमें इसके वर्तमान दशा को सुधारना होगा, तभी भविष्य में उसकी मौजूदगी का लाभ हम ले सकेगें। तालाबों के किनारे विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक क्रियाकलाप संचालित होते रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि तालाबों का अस्तित्व एक स्थल रूप में न होकर लोक मानस के जीवन का अविभाज्य अंग है। अभी 50 वर्ष पहले तक तालाब ही जल का प्रमुख स्रोत होते थे, तब तालाबों का रख-रखाव एक देवता मानकर किया जाता था। तालाबों और जलाशयों के देखरेख का काम पूरा समाज करता था। तालाब निर्माण से लेकर उसकी रक्षा में लोक अपनी जिम्मेदारी समझता था। नल, ट्यूबवेल आदि के आने से पानी के परम्परागत स्रोतों की उपेक्षा हुई। लोग वर्षाजल संग्रह का पुराना तरीका भूलते गए जिससे नए-नए तरह के खतरे हमारे सामने आने लगे। अब सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर फिर से तालाबों के महत्त्व को समझ कर उसके लिये काम शुरू हुआ है।
🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚
अपना गांव भरनाकलां, ब्लॉग संख्या - २
गांव के मंदिर गांव की अमूल्य धरोहर- भरनाकलां गांव में सामाजिक और निजी दोनों प्रकार के मंदिर हैं, जब में सामाजिक होने की बात कर रहा हूं तो सर्वसमाज के द्वारा हस्तक्षेप का अधिकार और कर्तव्य की बात है और जब निजता की बात कर रहा हूं तो समाज के द्वारा हस्तक्षेप का अधिकार नहीं होने की बात है लेकिन दर्शनार्थ के लिए सबजनों के लिए मंदिरों द्वार खुले हुए हैं ।
गांव के सभी मंदिरों का विवरण इस प्रकार है: -
1- गांव भरनाकलां में "ठाकुर श्री बिहारी जी महाराज" मंदिर सबसे भव्य व बृहद है। लगभग 500 वर्ष पुरातन श्री बिहारी जी मंदिर का निर्माण भरनाकलां ग्राम वासियों द्वारा करवाया गया था। मंदिर पुराने होने के सबसे बड़ा साक्ष्य मंदिर के जगा (पुराने समय में बहीखाते में सूचना एकत्रित करने वाले लोग) हैं । वो अलवर राजस्थान से आते थे । यह रामानंदी संप्रदाय का अनुसरण करते हुए सभी अन्य संप्रदाय अथवा यूं कहें कि सनातन धर्म की way of life को मानता है । मंदिर में श्री बिहारी जी महाराज विराजमान हैं उनके मूर्ति स्वरूप को उनके निजधाम वृन्दावन से लाया गया था, हाल ही में मंदिर का पुनर्निर्माण "मंदिर कमेटी" की देखरेख में कराया गया है। सम्पूर्ण ठाकुर द्वारे का जीर्णोद्धार किया गया है । वर्तमान में लॉकडाउन के समय मंदिर के चारों ओर नई बाउंड्री वॉल बनाई गई है । मंदिर का सारा खर्चा मंदिर की खेतीहर भूमि से प्राप्त पट्टे की राशि से मंदिर कमेटी द्वारा उठाया गया है । मंदिर के लिए एक ट्रस्ट बनाने के प्रस्ताव पर बातचीत जारी है । उसके 40 सदस्यों को चिन्हित कर लिया जाएगा । कोषाध्यक्ष व प्रधान प्रबंधक का चयन किया जा जाना बाकी है ।
वास्तुकला - श्री बांके बिहारी जी का मंदिर बहुत ही सुन्दर सफेद और श्याम संगमरमर से बना हुआ है। मन्दिर का प्रवेश द्वार बहुत ही आकर्षक और शानदार है। मंदिर में 2 दिशाओं में ठाकुर जी विराजमान हैं मुख्य द्वार में प्रवेश करने के बाद, एक आयताकार आँगन है ठीक सामने ही ठाकुरजी का दरबार है और और बाएं हाथ की तरफ काली माता का दरबार है । मंदिर के आँगन में तुलसी का थंबूला है । मन्दिर में पूजास्थल के बाहर मंदिर प्रांगण में महंतों के पदचिन्ह भी हैं। मंदिर के बाहरी और आंतरिक दीवारों को मंदिर के आकर्षण और प्रभाव के लिए सुंदर नक्काशियों और चित्रों से सजाया गया है। ठाकुरद्वार के दांयी ओर ब्रह्मर्षि सौभरि जी की मूर्ति विराजमान है ।
इस मंदिर के पुनर्निर्माण में अनेक महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखा गया है। सर्वप्रथम इसकी भव्यता को ही आधार बनाकर मंदिर को विशाल रूप में निर्मित किया गया है जिसमें उसका ' शिल्प सौंदर्य' सभी को प्रभावित करता है।
कृषिभूमि:- बिहारी जी के नाम 25 बीघा जमीन है । 21 बीघा भूमि लीडो बम्बी पर स्थित है और 4 बीघा भूमि गांव के समीप मंदिर के सामने । सिंचाई के लिए दोनों जगह भरतपुर फीडर बम्बे से पाइप लाइन की उचित व्यवस्था है ।
मंदिर महंत:- वर्तमान में मंदिर पर महंत भी हैं कुछ दिन पहले तक मंदिर श्री नंदराम बाबा थे । इनसे पहले श्री गोविंद दास बाबा मंदिर के महंत हुआ करते थे उनके देहांत के बाद श्री नंदराम बाबा को उनका उत्तराधिकारी बनाया गया था । मंदिर के महंतों की सूची इस प्रकार है- सेवादास बाबा, मौनी बाबा, बालकदास । इनसे पहले भी जो मंदिर महंत हुए हैं उनकी समाधियां मन्दिर केे दाहिने भाग की ओर बनी हुई हैं ।
पहले मन्दिर की खेती को आधे-बांटे पर दिया जाता था । उस समय मन्दिर में दूध के लिए कुछ गाय-भैंसों को भी रखा जाता था। उनकी सेवा के लिए एक विशेष सेवादार भी हुआ करता था । मंदिर की भूमि से आने वाली कमाई को कुछ साल तक महंत बालकदास ने अपने कब्जे में रखा वो एक-आध बार गाँव आते थे , गांव वालों ने विरोध जताकर उनसे महंत की गद्दी छीन ली और अन्य को महंत बना दिया । वैसे महंत सौभरि ब्राह्मण समाज से ही रहे हैं केवल बालकनाथ बाबा इस परंपरा का अपवाद हैं । महंत 4 बजे प्रातः शंख बजाकर ठाकुर जी को निंद्रा से उठाते हैं । औऱ लोगों द्वारा मनाये जाने वाले व्रत त्यौहार की सूचना जांरी करते हुए महंत माइक में आवाज लगाते हैं । फिर 5 बजे ठाकुर जी की आरती होती है ।
सरस्वती शिशु मंदिर:- मंदिर प्रांगण में ही श्री बिहारी जी महाराज शिशु मंदिर बना हुआ था, उसमें बहुत दिनों तक पठन- पाठन हुआ, यह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा मान्यता प्राप्त स्कूल था, यहाँ बच्चों की शाखा लगवाई जाती थी, स्कूल की पढ़ाई की शुरुआत सदाचार की प्रथम वेला से होती थी, 26 जनवरी व 15 अगस्त को बालकों के कार्यक्रम का मंचन होता था, RSS शिक्षा आयोग फरह, मथुरा से आचार्यों की नियुक्ति की जाती थी लेकिन अब उसको भी तुड़वाकर इसी वर्ष 2020 में मंदिर की बाउंड्री वॉल के अंदर ले लिया गया था । कक्षा आठवीं तक चलने वाले स्कूल में कभी प्रतियोगिताओं का दौर हुआ करता था, बाहर के स्कूलों के बच्चे आया करते थे । स्कूल में आसपास के गाँवों के बच्चे भी आया करते थे । महंत जी द्वारा मंदिर के पीछे मुहारवन में अच्छे हरे - भरे पेड़ - पौधे लगाए गए थे जो कि हमारे पर्यावरण को संतुलित रखने में बड़े ही सहायक हैं।
अभी स्कूल वाली जगह पर ग्राम पंचायत भवन का निर्माण कराया गया है और इसके बराबर में एक अस्पताल का निर्माण भी कराया गया है।
गौशाला - अभी बनना बाकी है ।
सामाजिक पुस्तकालय - अभी बनना बाकी है ।
2- राधा-कृष्ण मंदिर (छोटा मंदिर), सवा विसा ।
श्री राधाकृष्ण मंदिर (छोटा मंदिर) सवा विसा में नधा तालाब के समीप स्थित है । वास्तु के हिसाब से इसका प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में है जो कि बहुत ही शुभ माना जाता है । मन्दिर के मुख्य दरबार में विराजमान श्री राधा कृष्ण जी है । मंदिर में स्थित बहुत ही भव्य व मनमोहक मुर्तियां जो लोगों का मन मोह लेती हैं । मंदिर के पास 12 बीघा भूमि है जिसके मालिक स्वयं प्रेमी युगल स्वरूप श्री राधाकृष्ण जी ही हैं । मंदिर की खेतीहर भूमि को कृषि के लिए वार्षिक पट्टे पे उठाया जाता है ।
मंदिर का निर्माण सवा विसा भरनाकलां के लोगों ने ही मिलकर किया था। अब से कुछेक वर्ष पहले ही मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया है जिसमें सम्पूर्ण मंदिर में ग्रेनाइट पत्थर का प्रयोग गया है । मंदिर के द्वार पर भव्य स्वागत करती मुर्तियां लगाई गई हैं । यह मंदिर ग्राम की परिक्रमा में पड़ता है । ग्रामवासी जब गॉंव की परिक्रमा करते हैं तो अवश्य ही इस मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं । मंदिर प्रांगण में मंदिर कमेटी द्वारा वार्षिक 'श्रीमद भागवत कथा' का आयोजन होता है । सवा विसे में स्थित श्री राधाकृष्ण मंदिर (छोटा मंदिर) के महंत श्री उड़िया बाबा जिनका हाल ही में मुक्तिधाम को चले गए हैं जो लगभग 50 वर्षों से मंदिर के मुख्य पुजारी थे । युवावस्था से ही वो ग्राम भरनाकलां में रहे, अन्यत्र कहीं नहीं गए । वो नाटे कद के थे और वो ऐसी विद्या जानते थे लोग किसी वस्तु की चोरी या खो जाने पर *पूछा वाले* के पास जाते थे, लेकिन उड़िया बाबा इस मसले का हल मंदिर से बैठे-बैठे ही कर देते थे वो बता देते थे कि फल चीज वहाँ मिल जाएगी या इतने दिनों के बाद मिल जाएगी ।
3- ब्रह्मर्षि सौभरि आश्रम (प्याऊ वाली धर्मशाला) दश विसा
भरनाकलां में दश विसा की जनता (गांव के तीन थोकों/सेक्टर्स में से एक) द्वारा प्याऊ (प्राचीन नाम) सौभरि धर्मशाला का पुनर्निमाण ११००० रूपये प्रति घर के हिसाब से एकत्रित कर करवाया, उस समय १०० घरों से धन इकठ्ठा किया गया था, वैसे गांव में स्वसमाज के २०० से अधिक घर हैं । लगभग १०० घर सवा विसा और ढाई विसा में हैं। पुनर्निमाण से पहले यहां प्रवेश द्वार पर एक प्याऊ हुआ करती थी और वर्तमान में उसी जगह पर एक पानी टंकी लगवाई गई है जहां से राहगीर पानी पिया करते हैं।
वर्तमान में धर्मशाला के प्रवेश द्वार पर दाहिनी ओर श्री हनुमान जी विराजमान हैं। और बराबर में शिवलिंग (शिव परिवार) । फिर धर्मशाला का प्रांगण है जिसमें प्रत्येक वर्ष रामायण अथवा श्रीमद् भागवत कथा का वाचन होता है। यह कार्यक्रम श्रावण मास के महीने में अथवा होली, फाल्गुन मास के महीने में के आसपास होता है। वर्तमान में यहां के महंत श्री शिवम् शास्त्री जी हैं जो नित्य श्री ठाकुर जी की सेवा करते हैं। वह कई वर्षों से इस पद पर कार्यरत हैं। श्री महंत आसाम राज्य के निवासी हैं लेकिन ब्रज और ब्रजजन में अनंत विश्वास रखते हैं। गांव के हर कार्यक्रम में उनको बुलाया जाता है।
4- हनुमान मंदिर, समोखरी
5- तीनों ग्राम्य देवियां - ग्राम्य देवियां पथवारी मैया, चावड मैया, शैडो मैया।
i- पथवारी मैया:- भरनाकलां स्थित सवा विसा में विराजमान "पथवारी मैया" ।
ii- चावड मैया:- भरनाकलां स्थित ढाई विसा में विराजमान "चावड मैया" ।
iii- शैडो मैया:- भरनाकलां स्थित दश विसा में विराजमान "शैडो मैया" ।
🔸मीठी कुइआ के पास स्थित मंदिर, दश विसा
🔸स्कूलफॉर्म के सामने वाला शिव मंदिर, दश विसा
🔸महादेव मंदिर, दश विसा
इसके अतिरिक्त बहुत से ऐसे मंदिर हैं जो खेत खलियानों में बाग- बगीची अथवा कोठरियों के पास बने हैं।
क्यों है मंदिरों का महत्व:-
मंदिरों का हमारे जीवन में महत्व बहुत ही बड़ा है । मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन करने से मन को शांति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है. मंदिरों में पूजा-पाठ करने से भक्तों को मानसिक, शारीरिक, और आत्मिक रूप से मज़बूती मिलती है । मंदिर, धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष की प्राप्ति का साधन माने जाते हैं । हालांकि जप-तप और ध्यान के लिए एकांत बहुत जरूरी है। ऐसे में पर्वतों को भी देवी-देवताओं के निवास के लिए उपयुक्त माना गया हैं, मंदिर पूजा का वह स्थान है जिसका उपयोग आध्यात्मिक अनुष्ठानों और प्रार्थना और परंपराओं का अनुपालन जैसी गतिविधियों के लिए किया जाता है । यह अराधना और पूजा-अर्चना के लिए निश्चित की हुई जगह या देवस्थान है। यानी जिस जगह किसी आराध्य देव के प्रति ध्यान या चिन्तन किया जाए या वहां मूर्ति इत्यादि रखकर पूजा-अर्चना की जाए उसे मन्दिर कहते हैं। मन्दिर का शाब्दिक अर्थ 'घर' है।
मंदिरों में शंख, घंटे, और मंत्रों की ध्वनि से एक खास आवृत्ति बनती है। मंदिर किसी के मन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं और अक्सर उन्हें आशा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। कई हिंदुओं के लिए, मंदिर मुश्किल समय के दौरान शरण का स्थान है।
ध्वनि, प्रकाश, वायु आदि सभी मे तरंगें होती हैं। कोई भी तरंग सीधी रेखा में नही चलती सभी की अपनी आवृति होती है। विस्फोट होता है। ये जितनी अधिक शक्तिशाली होगी उसका उतना ही अधिक क्रिया क्षमता पर असर पड़ेगा। मन्दिरों में शंख, घण्टे और मन्त्रों की ध्वनि में एक विशेष आवृति बनती है। वह दैवीय ऊर्जा होती है जो हमें मानसिक शारीरिक और आत्मिक रूप से दृढ़ बनाती है।
हमारे देश में प्राचीन मंदिर धरती के धनात्मक यानी पॉजिटिव ऊर्जा केंद्रों पर बनाये गए हैं। ये मंदिर आकाशीय ऊर्जा के ग्रिड हैं। भक्त मंदिर में नंगे पैर होता है। इससे उसके शरीर में अर्थ प्रवाहित होने लगता है। जब हाथ जोड़ता है तो शरीर का ऊर्जा चक्र चलने लगता है। देव प्रतिमा के आगे सिर झुकाता है तो प्रतिमा से परावर्तित होने वाली पृथ्वी व आकाशीय तरंगे मस्तक पर पड़ती हैं और मस्तक पर स्थित आज्ञा चक्र पर प्रभाव डालती है। जिससे सकरात्मक विचार आते हैं। भक्त अपने अंदर एक विशेष ऊर्जा और हल्केपन तथा शांति का अनुभव करने लगता है।
भारत में कुल 6,48,907 मंदिर है । देश के दक्षिणक्षेत्र में सबसे ज्यादा संख्या में मंदिर हैं, जहां तमिलनाडु सबसे ऊपर हैं । अंकोरवाट ( कम्बोडिया) मन्दिर परिसर और दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक है, 162.6 हेक्टेयर (1,626,000 वर्ग मीटर; 402 एकड़) को मापने वाले एक साइट पर। यह कम्बोडिया के अंकोर में है जिसका पुराना नाम 'यशोधरपुर' था।
अभी सक्रिय धर्मों/संप्रदायों /पंथों में मंदिरों को किस नाम से जाना जाता है :-
हिंदू धर्म - मंदिर
बौद्ध धर्म - विहार
सिख धर्म - गुरुद्वारा
जैन धर्म - देरासर
पारसी धर्म - अगियारी
बहाई धर्म - उपासना गृह , ताओवाद - दाओगुआन
शिंटो - जिंजा
कन्फ्यूशीवाद - कन्फ्यूशियस
क्रिश्चियन - चर्च
इस्लाम - मस्जिद
यहूदी - सिनागॉग
अन्य नाम - हिंदू मंदिरों को क्षेत्र और भाषा के आधार पर कई अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जिनमें अलायम, मंदिर , मंदिरा , अम्बलम , गुड़ी , कावु , कोइल , कोविल , देउल , राउल , देवस्थान , देवालय , देवायतन , देवकुला , देवगिरिहा , देगुल शामिल हैं। , देव मंदिरया , और देवालयम ।
हिंदू मंदिरों की वास्तुकला का प्रकार:- हिंदू मंदिर वास्तुकला मुख्य रूप से दक्षिण की द्रविड़ शैली और उत्तर की नागर शैली, अन्य क्षेत्रीय शैलियों में विभाजित है। मंदिरों में वास्तु के मुताबिक निर्माण किया जाता है ।
भारत में मंदिर मुख्य रूप से तीन शैलियों में बंटे होते हैं: नागर शैली, द्रविड़ शैली, बेसर शैली.
नागर शैली के मंदिर उत्तर भारत में, द्रविड़ शैली के मंदिर दक्षिण भारत में, और बेसर शैली के मंदिर विंध्याचल पर्वत से लेकर कृष्णा नदी तक पाए जाते हैं । नागर और द्रविड़ शैलियों के मिश्रण को बेसर शैली कहते हैं. बेसर शैली को चालुक्य शैली भी कहा जाता है ।
हिन्दू मंदिर में अन्दर एक गर्भगृह होता है जिसमें मुख्य देवता की मूर्ति स्थापित होती है। गर्भगृह के ऊपर टॉवर-नुमा रचना होती है जिसे शिखर (या, विमान) कहते हैं। मन्दिर के गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा के लिये स्थान होता है। इसके अलावा मंदिर में सभा के लिये कक्ष हो सकता है।
🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚
अपना गांव भरनाकलां, ब्लॉग संख्या - ३
कुआ व कुइओं का संरक्षण व संवर्धन होते रहना चाहिए ।
भरनाकलां गांव के आसपास के कुइया व कुओं का पानी खारी है, इन जलस्रोतों की खुदाई के समय से या कालांतर में जल की प्रकृति खारी हो गयी, पूर्णरूपेण कह नहीं सकते लेकिन फिलहाल गांव व गांव के आसपास की भूमि पर बने सभी जलस्रोत बहुत खारी हैं । हमारे पूर्वज जल संरक्षण के लिए कुआं खुदवाते थे। हर गांव में 10 से 15 कुआं होते ही थे। पुराने समय में जब बारात बगैराह आती थीं तो नेग के तौर पर या सेवाभाव के अनुसार कुछ कुआ और कुइयाओं के लिए लोटा , बाल्टी देने का रिवाज हुआ करता था । परम्परागत दृष्टि से कुआ, कुइया, पोखर खुदवाने की क्रिया को हमेशा से ही पुण्यकर्म की श्रेणी में रखा जाता रहा है । पारम्परिक जलस्रोत अतीत में पेयजल आपूर्ति में सक्षम थे, लेकिन आज आधुनिकता का शिकार होकर साल दर साल बंद होने की कगार पर हैं।
हमारे गांव भरनाकलां के कुइआ व कुओं का विवरण:-
1-*फत्ती वाली कुइया(मीठी कुइया)*- सड़क के किनारे बम्बी पर स्थित है, कभी इस कुइया से सम्पूर्ण की ग्राम की स्वजातीय महिलाएं नीर भरण के लिए आती थीं, जब से पाइपलाइन की व्यवस्था ग्राम में हुई है तब से यह परम्परा बन्द हो गयी । फिलहाल कुइया अभी चालू हालत में है ।
2- बघेलों वाली कुइया- छाता-गोवर्धन रोड पर स्थित है फिलहाल इससे नीरभरण बंद है।
3- हरिजनों वाली कुइया- ये कुइया भी पास में ही है इसी रोड पर । फिलहाल बन्द पड़ी है ।
4- जाटवों वाली कुइया- भंगियों वाली कुइया के पास स्थित है । अभी पानी भरना बन्द है ।
5- दर्जियों वाली कुइया- स्कूल फार्म के पास , पानी भरना बन्द ।
6- बलवीर भगत जी वाली कुइया- स्कूल फार्म के सामने , कभी-कभार प्रयोग लेते हैं ।
7- रग्गो दादा वाली कुइया- बन्द
8- प्याऊ वाली कुइया (खारी कुइया)- नहाने के लिए अभी चालू हालत में है ।
9- गांव वाली खारी कुइया- फिलहाल पाट दी गयी है । कभी यह दश विसे की औरतों के नहाने की मुख्य कुइया और भैंसों की सानी करने के लिए पानी की मुख्य धारा थी।
10- सरकारी स्कूल वाला कुआ- फ़िलहाल पटा हुआ है ।
11- मरघट वाला कुआ- बन्द पड़ा है ।
12- भैंमी बाबा वाला कुआ- कभी-कभार प्रयोग में ।
13- गौरी इटोइयाँ जी वाली कुइया- बंद पड़ी है ।
14- अटीलेवालेन वाला कुआ- बम्बा पर स्थित है, कभी-कभार उपयोग में
15- मुकदमों वाली कुइया(दश विसा)- बन्द पड़ी है ।
16- मुकदमों वाला कुआ(दश विसा)- अटा दिया गया ।
17- हवेली वाली कुइया- चालू हालत में, पर कम उपयोग में
18- सट्ठान वाली कुइया- लीडो बम्बी के पास छाता-गोवर्धन रोड पर स्थित है । ना के बराबर उपयोग में
19- नैवासीन वाली कुइया- भरतपुर फीडर बम्बा पर स्थित है, अभी चालू हालत में ।
20- बाबाजी वाला कुआ- उपयोग में नहीं
21- कुम्हेरियन वाली कुइया
22- मन्ने वालेन की कुइया
23- कमरावालेन वाला कुआ
24- काइयाँन वाली कुइया
25- सेलवालेन वाली कुइया
26- बड़े मंदिर के पीछे वाला कुआ- बंद पडा है ।
27- मढ़ी वाला कुआ- पोखर के पास, बंद पड़ा है ।
28- नाले के पास वाला कुआ- बंद पड़ा है ।
29- मुहारी वाली कुइया कभी- कभार उपयोग में ।
30- नहर वाली कुइया-
31- मुखिया वाली कुइया
30- पारुआ वाली कुइया
31- कलेट्टर जी वाला कुआ (नद्या)
32- खिल्लू बाबा वाली कुइया
33- नम्बरदारन वाली कुइया
34- अक्खड़ों वाली कुइया
35- स्कूलफार्म वाली कुइया, पाट दी गयी
36- चरन मास्टर जी वाली कुइया
37-चंदा जी वाली कुईया
38- सोना वारी कुईया
39- गुल्लनपंडा जी वाली कुइया
इसके अतिरिक्त गांव में और भी कुइआ व कुआ हो सकते हैं जितना मालूम था उतना लिख दिया है।
🔸 आज स्थिति यह है कि गांव में चलते हुए एक-दो कुआं मिल जाए तो समझे की जल संचय की दिशा में अब भी ग्रामीण जागरूक हैं। पहले कुआं के पानी से भोजन बनाने, पानी पीने एवं पूजा करने का काम होता था। हमारी संस्कृति कुआं के पानी को शुद्ध मानती है। कुएं को कूप भी कहा जाता है । कुएं को खोदकर, ड्रिल करके, या बोर बनाया जाता है । कुएं को जीवन और उर्वरता का प्रतीक माना जाता है । कुएं के पानी का महत्व कम होता जा रहा है । कुएं का पानी पीने के साथ-साथ सिंचाई के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था । कुएं के पानी पर पर्यावरण में होने वाले बदलावों का असर पड़ता है । जब पेयजल व्यवस्था चरमरा जाती है, तब इन कुओं की उपयोगिता बढ़ जाती है। लोग कुआं और हैंडपंप के माध्यम से पेयजल एवं निस्तार जल का उपयोग करते हैं। दो दशक पहले जब हैंडपंपों की कमी और नलजल योजना का अभाव था तब कुआं ही ऐसा साधन था।
हिंदू धर्म में कुआं पूजन की परंपरा का विशेष महत्व होता है। कुआं पूजन पुत्र प्राप्ति पर किया जाता है। साथ ही यह ग्रह-नक्षत्रों को शांति के लिए भी किया जाता है। खासतौर से मूल नक्षत्रों में जन्मे बच्चों के लिए यह पूजा जरूरी मानी गई है। कई स्थानों पर इसे जल पूजा या जलवा पूजा भी कहा जाता है। रिक्ता तिथि यानी शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी को छोड़कर, अन्य किसी भी तिथि पर कुआं पूजन संस्कार किया जा सकता है। वहीं, कुआं पूजा के लिए सोमवार, बुधवार और गुरुवार का दिन अच्छा माना गया है। साथ ही चैत्र और पौष चंद्र महीनों को छोड़कर, सभी चंद्र महीने कुआं पूजा अनुष्ठानों किया जा सकता है। मृगशीर्ष, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, अनुराधा, मूल और श्रवण नक्षत्र भी कुआं पूजन संस्कार के लिए अच्छे माने जाते हैं। हिंदू धर्म में शादी-विवाह संस्कारों में भी बच्चे का कुआं पूजन किया जाता है। कुएं पूजन समारोह आमतौर पर नवजात शिशु के जन्म के 11वें दिन किया जाता है ।
▪️कुएं का आकार हमेशा गोल होता है:-
किसी दूसरे आकार की तुलना में गोल कुआं ज्यादा मजबूत होता है और अपनी जगह पर स्थिर रहता है। आपको बता दें कि जब भी किसी द्रव को कहीं भी स्टोर किया जाता है तो द्रव उसकी दीवारों पर प्रेशर डालता है। अगर कुआं किसी अन्य आकार का होता तो पानी का प्रेशर उस आकार के कोनों की दीवारों पर सबसे ज्यादा पड़ता जिसकी वजह से कुएं की दीवारों को नुकसान भी पहुंचता है।गोल होने की वजह से कुएं में कोई भी कोना नहीं होता है। जिस वजह से पानी का प्रेशर भी हर तरफ एक समान ही पड़ता है और कुएं को जल्दी कोई भी नुकसान नहीं होता है।
🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚
अपना गांव भरनाकलां, ब्लॉग संख्या - ४
मेरा गांव मेरा गर्व:- "पाग" जिम्मेदारी और सामाजिक सम्मान का सूचक है। पाग या पगड़ी जिसे परिवार या समाज के सम्मानित व्यक्ति इसे अपने सिर पर धारण करते हैं। ऐसा नहीं है बिना पाग/पगड़ी पहने किसी को सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता हो। समय के ढलते बहाव में धीरे-धीरे यह प्रतीक उन सम्मानित जनों के लिए भी विशिष्ट आयोजनों/अवसरों का आडंबरधर्मी प्रतीक बनकर ही रह गया है। गांव के उन्नायकों को स्वजाति अवंटक/अल्ल विशेष की लकीर पर डटे रहने के बजाय इस दिशा में समय के अनुसार अद्यतन करते रहना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो पाता। अपनी सांस्कृतिक धरोहरों पर गर्व करना अच्छी बात है, पर उन्हें जानना जरूरी है कि इनका चलन किस आधार पर चला। परंपरा को जाने बगैर कोई भी उसका समुचित सम्मान नहीं कर सकता।
👉इस प्रकार भरनाकलां गांव में पहले से प्रचलित बड़ा थोक दश विसा (१४ पाग)+पल्ला थोक{ढाई विसा+सवा विसा (१४)}=२८ । भरनाकलां गांव में "पाग" बरगला/नुक्ते (अल्ल/अवंटक) के कुछ परिवारों को पारंपरिक तौर पर दी जाती रही है । ये निम्नलिखित हैं -
🔸दश विसा के पागों (पागियों की) संख्या:-
1 अटावाले
2 मुकदम परिवार
1 हडीला परिवार
1 फरसा वाले
1 सट्ठा परिवार
2 पचौरी परिवार
1 मुखिया जी
1 मोहन गुरु जी
1 भैमी परिवार
1 अटीलेवाले
2 मिश्री बाबा
Total= 14
🔸ढाई विसा और सवा विसा (दोनों थोक):-
2 नैवासी, 1 कुसैंड़ा, 3 सेलवारे, 1 लम्बरदार, 2 मुकदम , 1 खिल्लू बाबा, 3 नंदा बाबा, 1 कमरावाले ।
Total= 14
🔸इसके अतिरिक्त भरनाकलां गांव में इटोइयां उपगोत्र (अल्ल/अवंटक) के हर परिवार की भी अपनी एक पाग है। इस परंपरा का निर्वाह अभी हाल के कुछ ही वर्षों से हुआ है। इनकी संख्या शायद २४ अथवा ३६ है।
▪️पागधारकों को नेग/उपहार बतौर कुछ ना कुछ देने का रिवाज है- यह विवाह आदि के शुभ अवसरों पर कुछ धन/ वर्तन आदि देने की प्रथा है। कुछ हिस्सा, भेंट, शादी ब्याह में रिश्तेदारों से मिलने वाली शगुन की कुछ राशि इन पागधारियों को बतौर सम्मान दी जाती है । गांव, गोत्र, सतगामा, अठगामा, बारहा(बारह गाँव), खाप तथा पाल़ आदि के चौधरियों को भी हरियाणवी लोकजीवन में पगड़ी बांधने की परंपरा रही है, इतना ही नहीं, यहां पर ब्याह-शादी तथा अन्य अवसरों पर रूठे हुओं को मनाने के लिए पगड़ी उतारकर अंतिम प्रयास के रूप में मनाने की परम्परा अब भी कहीं-न-कहीं दिखाई पड़ती है। राजस्थान में भी पाग अन्य राज्यों से अधिक प्रचलन में है।
✍️ अपने गांव के कुछ तथ्यों को जानना अच्छी बात है जैसे हमारे गांव का नाम भरनाकलां है इसका अर्थ क्या है? भरनाकलां शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, भरना और कलां, भरना का मतलब है स्थापना और कलां शब्द फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है बड़ा । इस प्रकार भरनाकलां का अर्थ होता है बड़ी स्थापना या बड़ी बस्ती। जैसे छोटा भरना या भरनाखुर्द जिसका अर्थ है छोटी बस्ती। ये शाब्दिक अर्थ है लेकिन समय/काल के चलते वर्तमान में इन नामों (कलां/खुर्द)के गांव की जनसंख्या कम - ज़्यादा हो सकती है।
किसी गांव का नाम सुनने पर स्वाभाविक जिज्ञासा होती है कि उसका नाम कैसे पड़ा होगा । अमूमन हम इन प्रश्नों को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन जब हम ऐसा करते हैं तो क्या उस स्थान से जुड़े ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संदर्भों को विस्मृति की खाई में नहीं धकेल देते हैं लेकिन इतिहास के मामले में कई बार हम इतने अभिजनवादी हो जाते हैं कि अपने ही पूर्वजों के इतिहास को नजरअंदाज कर जाते हैं । उनकी जिजीविषा और ज्ञान परंपरा से खुद को दूर कर लेते हैं । किसी गांव के नाम की व्युत्पत्ति के द्वारा उसके इतिहास को समझने की कोशिश के बहुत कम उदाहरण हैं । हमारे जनमानस में यह बात बैठी हुई है कि किसी स्थान या जगह को राजा-महाराजा या प्रभुत्वशाली लोगों द्वारा ही बसाया जाता है । ऐसा नहीं है ये कोई भी हो सकते हैं लेकिन हैं तो हमारे पूर्वज या उनसे संबंधित।
🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚
अपना गांव भरनाकलां, ब्लॉग संख्या - ५
भरनाकलां गांव में सौभरेय अहिवासी ब्राह्मणों के "उपगोत्रों/अवंटक/ अल्ल" के नाम इस प्रकार से हैं-
1-नुक़्ते(बरगला) 2- इटोइयाँ 3-कुम्हेरिया 4-तगारे 5- भुर्रक 6-सिकरोरिया 7-परसईंयां 8-बजरावत 9- रमैया 10-दीगिया 11-कांकर 12- पचौरी 13- प्रधान(पधान)
▪️ हर गाँव 20 विसा/विस्वा (१०० फीसद) का होता है हमारे गांव के गांव के तीनों थोक 10 विसा+1.25 विसा+2.5 विसा+ 6.25 विसा (डिरावली और और नहर पार वाले दोनों नगलों को मिलाकर बीस विसा बनता है। गाँव भरनाकलां तीन थोकों (सेक्टर्स/खण्डों) में बँटा हुआ है जिसके अंतर्गत "दश विसा", "ढाई विसा", "सवा विसा" आते हैं । भरनाकलां में स्वसमाज के 13 में से 11 उपगोत्र "दश विसे" में पाए जाते हैं । ढाई विसे में 3 व सवा विसे में 2 उपगोत्रों के लोग निवास करते हैं ।
🔸वर्तमान में स्वसमाज के सभी बच्चों के विवाह संबंधों में अपने माता- पिता के उपगोत्रों/अल्ल (इंटरनल गोत्र) को छोड़कर अन्य उपगोत्रों में से ही नया रिश्ता जोड़ा जाता है ।
1- बादर 2- सोती (सत्ल) 3- पचौरी 4-भाट (भटेले) 5-पधान 6-रतिवार 7- गौदाने (गौदानी) 8-तगारे 9-दीगिया 10- नुक़्ते (बरगला) 11-भुर्रक(भेड़े)12- रमैया 13-कुम्हेरिया 14-इटोईया 15-सीहइयाँ 16-सैंथरिया 17-बसइया 18-नन्दीसरिया 19-बजरावत 20-परसैंया 21-करिया 22-नालौठिया 23-दुरकी 24-विहोन्याँ 25-ओखले 26-करौतिया 27-मुडिनिया 28-गागर 29-डामर 30-गलवले 31-छिरा 32-जयन्तिया 33-डिड्रोइया 34-तसिये 35-दुर्गवार 36-दिरहरे 37-अझैयां 38-नायक 39-उमाड़िया 40-कांकर 41-रौसरिया 42-औगन 43-सिरौलिया 44-पलावार(पल्हा) 45- सिकरोरिया 46-चोचदिना 47-गलजीते 48- किलकिले 49-तागपुरिया 50-काठ
******************************************
🌏ब्रह्मर्षि सौभरि जी की ५० पत्नियों में से कुछ नाम तथा उनसे व्युत्पन्न सौभरेय अहिवासी ब्राह्मणों के अल्ल/अवंटको के नाम निम्नलिखित हैं:-
रानियों के नाम और उपगोत्र/अवंटक
1- बद्रिका- बादर
2- श्रोत्या- श्रोती अथवा सोती
3-पंचरी- पचौरी
4-गोदानी-गोदाने
5-भटी- भाट अथवा भटेले
6-प्रधानी-पधान
7-रतिवरी-रतिवार
8-तगन्या-तगारे
9-प्रलिहा-पल्हा अथवा पलावार
10- दीर्घा-दीगिया
11- श्रीकर्पूरी- सिकरोरिया
12-नुक्ता-नुक़्ते अथवा बरगला
13-भाविक्रा- भुर्रक
14-रमणीय-रमैया
15-कुंभार्या -कुम्हेरिया
16-ईड़ा-इटोइयाँ
17-सिंहमुग्रा- सीहइयाँ
18-सन्तरी-सैंथरिया
19-वासुकी-बसैया
20-नद्या -नंदिसरिया
21- बज्रावली- बजरावत
22-अजहा-अझैया
23-प्ररसी- परसईयां
🔹 स्वसमाज के कई गाँवों के नाम उपगोत्रों के नाम पर भी रखे गये हैं ।
जैसे-
गाँव- उपगोत्र
सैंथरी- सैंथरिया
सीह- सीहइयाँ
परसों- परसईयाँ
कुम्हेर- कुम्हेरिया
बहुत से गाँवों के नाम ब्रह्मर्षि सौभरि वंशजों की क्षेत्रीय उपाधि (अहिवासी) स्वरूप मिले नाम के साथ जुड़े हुए हैं जैसे-
नगला अहिवासी
अहिवासियों का पुरा ।
आज भी स्वसमाजी जन अपने उपगोत्र के मूलगाँव में छोटे बच्चों का मुंडन अपनी रीति- रिवाज के अनुसार ही कराते हैं । ऐसे गांवों में मघेरा गांव का नाम आता है यहां भुर्रक उपगोत्र के लोग निवास करते हैं यहाँ वे अन्य उपगोत्रों की तुलना में बहुलता में हैं ।
✍️गोत्रीय शब्द से आशय उन व्यक्तियों से है जिनके आपस में पूर्वजों अथवा वंशजों की सीधी पितृ परंपरा द्वारा रक्त संबंध हों अर्थात् भाई, भतीजा, भतीजे के पुत्रादि गोत्रज कहलायेंगे । किसी भी एक जैसे उपगोत्र का पुरुष उसी उपगोत्र की कन्या से विवाह नहीं कर सकता था। एक समान उपगोत्र होने के कारण वो भाई-बहिन समझे जाते हैं । हिन्दू धर्म की सभी जातियों में गोत्र पाए गए है । गोत्र को लेकर आयुर्वेद में स्पष्ट रूप से लिखा है कि यदि समान प्रकार के रक्त में यदि मेल होता है और उससे संतान उत्पत्ति होती है तो उस संतान का रक्त अर्थात DNA कमजोर होगा जिससे उसमे कई प्रकार की बीमारियाँ होने की सम्भावना होती है जैसे की शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का कम होना ,शारीरिक विकृतियाँ होना, वंशानुगत बीमारियाँ होना आदि स्वाभाविक है। संस्कृत व्याकरण के रचनाकार महर्षि पाणिनि जी द्वारा गोत्र की परिभाषा- ‘अपात्यम पौत्रप्रभ्रति गोत्रम्’ अर्थात ‘गोत्र शब्द का अर्थ है बेटे के बेटे के साथ शुरू होने वाली (एक साधु की) संतान्। गोत्र, कुल या वंश ऐसी संज्ञा है जो उसके किसी मूल पुरुष के अनुसार होती है।
🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚
अपना गांव भरनाकलां, ब्लॉग संख्या ६-
मथुरा संग्रहालय में गांव भरनाकलां से खुदाई में प्राप्त यक्षिणी और यक्षराज की मूर्तियां मथुरा संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है। यहाँ उत्खनन से प्राप्त प्राचीन पुरातात्त्विक धरोहर को सहेज कर रखा गया है ताकि आने वाली पीढी उससे परिचित हो सके।
✍️ भवन निर्माण के समय खुदाई के दौरान इन मूर्तियों को प्राप्त किया गया था ( थोक दश विसा से) । शुरुआत में इन मूर्तियों को ग्रामवासियों द्वारा ठाकुर बिहारी जी महाराज मंदिर परिसर में रखा गया, यहां पर इन मूर्तियों के आने के चोर/तस्कर आदि आने लग गए इसके बचाव व धरोहर को सहेजने के उद्देश्य से इन्हें सरकारी अधिकारियों से संपर्क करके इसे संग्रहालय भिजवाया गया। हो सकता जहां से यह मूर्तियां निकली थी कभी उस स्थान पर मंदिर रहा हो या आताताईयों के समय देवमूर्ति को छुपा के रखा गया हो। ज़्यादातर टीलेदार गांव बहुत ही पुराने हैं या फिर कभी रजवाड़ा भूमि रही हो, उस समय की छावनियों तरह प्रयोग करते हों उस स्थान पर इन मूर्तियों का निकलना कौतूहल से कम नहीं। क्या आपने कभी मथुरा संग्रहालय में विजिट किया है?
बकौल ' श्री कैप्टन हरिहर बाबू जी'
"ये दो प्रतिमाऐ स्व. श्री भोलाराम शर्मा के नव निर्मित मकान की नींव की खुदाई में प्राप्त हुई थी।
ग्रामीण नागरिको ने प्रतिमाओं को ले जाकर गाँव के बाहर ठाकुर बिहारी जी महाराज मंदिर के बाहर विशालकाय इमली के पेड के नीचे रखवा दिया था । तत्कालीन गाँव पंचायत प्रधान स्व0 श्री बृह्मानन्द जी थे। उन दिनों मथुरा में कुख्यात बडे-बडे मूर्ति तस्कर प्राचीन मूर्तियों की तस्करी कर विदेश भेजकर मोटी कमाई करने के लिए मशहूर थे। गाँव भरनाकलाँ शहर से बहुत दूर स्थित होने, कच्ची सडक, शिक्षा का अभाव होने, संचार के साधनो का अभाव और अधितर भोले-भाले ग्रामीण व्यक्तियों के कारण इस तरह की जानकारी से अनभिज्ञ था। बिहारी जी महाराज की कृपा से मूर्ति तस्करों को कोई जानकारी हासिल नही हो सकी।
कुछ दिन बाद जब कैप्टन हरिहर शर्मा यानी मैं सेना से अवकाश पर गाँव आया, आकर विशालकाय यक्ष यक्षणीयों की प्रतिमाएं देखी, ग्रामीण नागरिकों को समझाया, गाँव पंचायत प्रधान जी की मुहर लगवाकर पत्र लेकर पहले थाना बरसाना को घटनाक्रम की लिखित जानकारी दी। पुलिस कोई जिम्मेदारी को तैयार नहीं
हुई। तत्काल मथुरा जाकर जिलाधिकारी महोदय को लिखित सूचना दी गई। जिलाधिकारी महोदय के आदेश पर पुरातत्व संग्रहालय डैम्पीयर नगर के अधिकारीगण उसी दिन गाडी लेकर गाँव पहुंचे और दोनो प्रतिमाओ को त्वरित संग्रहालय पहुंचाया गया। पहले इन प्रतिमाओं के प्राप्त होने का स्थान अंकित नही था। कई-कई बार जब भी छुट्टी पर आते, पुरातत्व संग्रहालय विभाग के जिम्मेदार अधिकारीगण और जिलाधिकारी महोदयों से भेंटकर अनुरोध करने पर भी स्थान का नाम अंकित नही हो सका। लेकिन प्रयास करते रहने पर सेवानिवृति पर विश्व हिन्दू परिषद के जिला अध्यक्ष का दायित्व निर्वहन करते समय जिला अधिकारी से निकटता बढी और प्रयास जारी रहे। जुलाई 2003 मे तत्कालीन जिलाधिकारी महोदय डा0 श्री रमाकांत शुक्ला जी के आदेश पर पुरातत्व संग्रहालय के अधिकारीगण ने पिछले अभिलेख रजिस्टर में ढूंढे और गाँव भरनाकलाँ का नाम अंकित किया ।
(राजकीय संग्रहालय मथुरा)पुरातत्व संग्रहालय डैम्पीयर नगर मथुरा तथा सदर तहसील मथुरा के निकट स्थित जैन पुरातत्व संग्रहालय में जितनी भी पुरातत्व महत्व की प्रतिमाऐ हैं उनमें सबसे बडी और विशालकाय प्रतिमाऐ गाँव भरनाकलाँ से प्राप्त हुई दोनो प्रतिमाएं ही हैं। वर्तमान में गाँव के अनेक युवा शिक्षित है, उच्च स्तरीय जॉब और साधन सम्पन्न हैं। Mobile और AI का काल है। सभी को मथुरा , डैम्पीयर नगर स्थित इस गाँव की धरोहर को देखना चाहिए ।
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
▪️राजकीय संग्रहालय, मथुरा, जिसे आमतौर पर मथुरा संग्रहालय के रूप में जाना जाता है , भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा शहर में एक पुरातात्विक संग्रहालय है । संग्रहालय की स्थापना 1874 में मथुरा जिले के तत्कालीन कलेक्टर एफएस ग्राउस ने की थी । शुरुआत में, इसे कर्जन पुरातत्व संग्रहालय, फिर पुरातत्व संग्रहालय और अंत में इसका नाम बदलकर "राजकीय संग्रहालय मथुरा" कर दिया गया।
👉 संग्रहालयों के कुछ प्रकार ये रहे:-
कला संग्रहालय
प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय
विज्ञान संग्रहालय
इतिहास संग्रहालय
मूर्तिकला संग्रहालय
तारामंडल
राज्य इतिहास संग्रहालय
चित्रशाला
बाल संग्रहालय
सैन्य और युद्ध संग्रहालय
🔸 भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्कृति मंत्रालय के अधीन है। संग्रहालयों के माध्यम से कला, इतिहास, वैज्ञानिक या सांस्कृतिक महत्व की वस्तुओं को रखा जाता है । इन वस्तुओं को संरक्षित किया जाता है और जनता के लिए प्रदर्शित किया जाता है । भारत में लगभग 14,201 संग्रहालय है, जिनमें सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और कलात्मक संग्रह की विस्तृत श्रृंखला प्रदर्शित होती है ।
🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚
अपना गांव भरनाकलां ब्लॉग संख्या - ७
मेरा गांव मेरा गर्व!
रंग वाली होली (धुलेंडी) के दिन अपने गांव भरनाकलां के अंतर्गत वर्षभर में लगने वाला "होली मेला" सबसे बड़े उत्सव के रूप में-
गांव भरनाकलां भी भारत के लाखों गांवों जैसा ही है । लगभग साढ़े चार सौ घरों की इस बस्ती का गांव है भरनाकलां ! भरनाकलां गांव छाता-गोवर्धन रोड पर स्थित है । गांव के पूर्व में भरनाखुर्द, पश्चिम में ततारपुर, उत्तर में सहार, दक्षिण में पाली गांव स्थित है । गांव के तीनों ओर प्रमुख तालाब हैं इसके पूर्व में श्यामकुण्ड, पश्चिम में नधा, दक्षिण में मुहारी(मुहारवन) एवं उत्तर में समोंखरी है । गांव में बारात के ठहरने के लिए बारात घर है जहां की व्यवस्था भी अति उत्तम है । गांव में खाद गोदाम भी है । पीने के स्वच्छ जल की व्यवस्था गांववासियों ने बिना सरकार की सहायता लिए बगैर,स्वयं यहाँ के लोगों व्यवस्थित की गई है । यहां के लोग हर क्षेत्र में कार्य करने में सक्षम होते जा रहे हैं। विश्वभर में अन्य देशों की तुलना में “भारत” वास्तविक रूप से आज भी गांवों का ही देश है। कला, संस्कृति, वेशभूषा के आधार पर आज भी ‘गांव’ देश की रीढ़ की हड्डी बने हुये हैं। प्रत्येक गांव का एक अपना ही महत्व होता है जिसका पता वहां रहने वाला ही जानता है।
✍️गांव भरनाकलां में होली, दीवाली, रक्षाबंधन, दशहरा , शरद पूर्णिमा बडे धूमधाम से मनाये जाते हैं विशेषकर होली का त्यौहार बड़े ही हर्ष-उल्लास के साथ सब ग्रामवासी मिलकर मनाते हैं । रंगवाली होली जिसे धुलैंडी बोलते हैं उसी दिन गाँव का मेला होता है । मेले वाले दिन सभी नाते- रिश्तेदार अपने-अपने रिश्तेदारों के यहाँ आते हैं । उस दिन गांव में दिन निकलते ही होली का खेल शुरू हो जाता है । सब लोग हाथों में रंग, गुलाल लिए घरों से बाहर निकल कर सभी लोगों को रंग लगाते हैं और DJ और बाजे के साथ गांव की पूरी परिक्रमा करते हैं । ये एक जुलूस की तरह होता है । ये जुलूस होली के उत्सव में चार चांद लगा देता है । यह एकता का प्रतीक है । इसमें सभी धर्म-जाति के लोग होते हैं ।
क्षेत्र के हिसाब से गांव ‘तीन थोक’ (३ सेक्टर्स ) में बँटा हुआ है, मेले की फेरी की शुरुआत दश विसा के "रामलीला स्थान" से होती है । इसके बाद फेरी ‘नीम वाला चौक’ से होते हुए ‘कुम्हरघड़ा हवा’ की ओर बढ़ती है । इसके बाद "ढाई विसा" की तरफ बढ़ते हैं जो कि ‘ईटोइयाँ परिवारों’ को रंग लगाते हुए आगे बढ़ते और कई परिवार जो अपने घर के सामने ही चाय पानी पिलाकर ग्रामवासियों का स्वागत करते हैं । विश्राम लेने के बाद आगे बढ़ते हुए ‘पोस्टऑफिस’ की तरफ होते हुए सवा विसा में प्रवेश करते हैं, यहां एक राधाकृष्ण मंदिर भी है, सब लोग ठाकुर जी को रंग लगाते हैं । यहाँ आकर सारे ग्रामवासी ‘तीनों थोकों के लोग’ इक्ट्ठे हो जाते हैं । इस तरह से लोग धीरे -धीरे आगे रामलीला स्थान की तरफ ‘सवा विसा’ की ओर से होते हुए चलते हैं । यहाँ से रास्ता थोड़ा सँकरा है इसलिए DJ वाली गाड़ी को निचले परिक्रमा मार्ग से निकालते हैं । इसके बाद फेरी का प्रवेश फिर से "दश विसे" में होता है और रामलीला में मैदान पर आकर इस रंगवाली होली का समापन क़रते हैं । सब लोग अपने-अपने घरों को चले जाते हैं और नहा-धोकर दोपहर से लगने वाले मेले की तैयारी करते हैं । सब के यहाँ पर 12 बजे के बाद रिश्तेदार आने लगते हैं । चारों तरफ खुशियों का नजारा होता है ।
🔹फिर शाम को करीब 3 बजे से ‘ भरनाकलां काली कमेटी’ की तरफ से ‘काली’, पट्टेबाजी, घायल प्रदर्शनी व अलग-अलग अनौखी झाकियां निकाली जाती है । सुबह वाली ‘होली की फेरी’ की तरह ही "काली के खेल को" पूरे गांव में होकर निकालते हैं । 6:30 बजे शाम तक इसका समापन उसी रामलीला स्थान पर आकर हो जाता है । फिर से सब अपने -अपने घर चले जाते हैं और अतिथियों की आवभगत करते हैं । पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं का भी बराबर योगदान इस दिन रहता है । वह सुबह से आने वाले सगे- संबंधियों के लिए व्यंजनों की व्यवस्था करती हैं । इसके बाद करीब 11 बजे से रात को लोकनृत्य, नौटंकी, रसिया दंगल आदि का प्रोग्राम सुबह 4 बजे तक होता है । इसी के साथ अगली सुबह फिर किसी अन्य गांव में मेले शुरु होता है।
👉इस तरह से हर साल यही परंपरा सदियों से चली आ रही है । इसी तरह से स्वसमाज के ब्रजमंडल में स्थित अन्य गांवों में भी क्रमवार होली के मेलों का आयोजन होता है । होली के इन्हीं मेलों के आधार पर आपस मिलने के बहाने 'घर छोड़कर रह रहे शहरों में रहने वाले अपनी समाज के लोग' प्रतिवर्ष मथुरा, नोएडा, ग्वालियर इत्यादि जगहों पर ‘होली मिलन’ का समारोह क़रते हैं ।
भारत में होली रंगों का त्योहार है:-
यह उत्सव अलग-अलग प्रदेशों में भिन्नता के साथ मनाया जाता है। ब्रज की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु होती है। बरसाने की लठमार होली बहुत प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन पर लाठियां भांजती है इसके बल्देव नगर दाऊजी बाबा के दरबार में मनाया जाने वाला हुरंगा में महिलाएं पुरुषों और ग्वालों को या यूं कहें होली के हुरियारों को कपड़े से निर्मित कोड़ों से मारती हैं। होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण सनातन धर्म के लोगों का त्यौहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है।
✍️ पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते हैं। इस दिन चौराहों पर व जहाँ कहीं अग्नि के लिए लकड़ी एकत्र की गई होती है, वहाँ होली जलाई जाती है। इसमें लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। कई स्थलों पर होलिका में भरभोलिए जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं। होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए। लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहाँ भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर ज्योतिषियों द्वारा निकाले मुहूर्त पर होली का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है। होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है। गाँवों में लोग देर रात तक होली के गीत गाते हैं तथा नाचते हैं।
✍️दूसरे दिन, जिसे प्रमुखतः धुलेंडी व धुरड्डी, धुरखेल या धूलिवंदन इसके अन्य नाम हैं, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं।
रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्यौहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं। बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर ढोलक-झाँझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं। चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है। गुझिया होली का प्रमुख पकवान है जो कि मावा (खोया) और मैदा से बनती है और मेवाओं से युक्त होती है इस दिन कांजी के बड़े खाने व खिलाने का भी रिवाज है। नए कपड़े पहन कर होली की शाम को लोग एक दूसरे के घर होली मिलने जाते है जहाँ उनका स्वागत गुझिया,नमकीन व ठंडाई से किया जाता है।
🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚
गांव भरनाकलां: मानसिक भाव
ब्लॉग संख्या - ८
✍️भरनाकलां ग्रामसमाज की विरासतों की देखभाल व ग्रामवासियों के कल्याणकारी सहायता हेतु उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए एक वेब पोर्टल व ऐप का प्रयोग किये जाने की आवश्यकता है। इस वेब पोर्टल व ऐप के जरिए कोई भी जन अपनी इच्छानुसार स्वसमाज की आर्थिक सहायता के लिए "भरनाकलां ग्राम्यकोष" में दान दे सकता है। इस ग्राम्यकोष की देखरेख गांव के लोगों के द्वारा बनाई समिति के हाथ ही हो। इस पहल के जरिये लोगों को एक-एक करके धन एकत्रित करने से बचाब तथा पैसों के नाम की पर्ची काटने का दबाव से भी छुटकारा मिलेगा। कई जागरूक अन्य ग्रामों के लोग इन डिजिटल सुविधाओं से युक्त साधनों से समाज को मजबूती दे रहे हैं।
मान लो की हमारे स्वसमाज की ग्राम जनसंख्या ४००० है और ये सब प्रतिव्यक्ति 100 रुपये भी सहयोग हेतु देते हैं तो ग्राम्यकोष में लाखों रुपए का प्रबंध इस विधि से बडी आसानी से हो जाएगा और इससे किसी की जेब पर भी ज्यादा खर्च भी नहीं आएगा अंततः इन रुपयों के माध्यम से गांव के सामाजिक विकास कार्यों को पूरा किया जा सकता है । इससे पहल के जरिये ग्राम के सभी के लोगों को जोड़ा जा सकता है, सभी को सहभागिता निभाने के तौर भी देखा जा सकता है । इस प्रक्रिया से उन लोगों से भी बचा जा सकेगा जो ज्यादा धन देते हों फिर उसके बाद उन्हें लगता हो कि हम ही समाज के सूत्रधार हैं और साथ ही वो लोग भी वंचित नहीं होंगे जो कहते हैं कि हमें कुछ पता ही नहीं, हमारी कोई सुनता नहीं, हमारा प्रभुत्व नहीं है। संग्रह के लिए पैसे की उगाही भले कम रुपयों में हो परन्तु सहभागिता सभी की नितांत आवश्यक है । तभी हम अधिक-अधिक ग्राम्यजनों को एक ही माला में बीजों जैसे देख पाएंगे ।
इस फंड से यथासम्भव समाज के अभावग्रस्त विद्यार्थियों को उचित शिक्षा हेतु छात्रवृत्ति/अध्ययन ऋण आदि की व्यवस्था हो सकेगी। इसके अतिरिक्त फंड से समाज में शिक्षा का प्रसार, प्रचार, कैरियर विकास, व्यक्तित्व विकास, सुसंस्कार एवं उत्तम शिष्टचार हेतु सामग्री प्रकाशन, शिविर, गोष्ठी इत्यादि का निरन्तर प्रयास हो सकेगा।
▪️निम्नलिखित योजनाओं का भी लाभ लें -
सांसद निधि व विधायक निधि से हर समाज के उत्थान हेतु बारातघर, धर्मशाला, स्कूल व छात्रावास इत्यादि के लिये पैसा आवंटित किया जाता है। सरकारी योजनाओं के माध्यम से हम इन कामों की अर्जी क्षेत्रवार वहाँ के निवासी (स्वजन) इकट्ठा होकर अपने विधायक व सांसद के लिये दे सकते हैं । इन निधियों के तहत गाँवों के अलावा शहरों में भी अच्छी जगह पर जमींन अथवा भवन मुहैया कराया जाता है । जागरूक समाज इन योजनाओं का लाभ ले चुके हैं । अगर गांव की बात करें जहाँ - जहाँ जो समाज बहुलता में रहते हैं वहाँ इन स्कूल व धर्मशाला इत्यादि का निर्माण होना चाहिए ।
किसी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले विधान सभा व विधान परिषद सदस्य कभी भी अपने पद से हट सकते हैं लेकिन "आवंटन" निर्वाचन क्षेत्र के लिए होता है इसलिए इस योजना के अन्तर्गत निर्माणाधीन कार्य पर कार्रवाई निरन्तर जारी रखी जाती है । विधायक निधि के धन का का प्रयोग विधानसभा क्षेत्र में विकास कार्यों का संचालन करने में होता है । विधायकों को हर साल 'विधायक निधि' आवंटित की जाती है, जिसका प्रयोग विधायक की सलाह पर जिला प्रशासन "विकास कार्यों" के लिए जारी करता है।
हालांकि गांव में ज्यादातर समाज पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में रहते हैं, उन्हें किसी के सहारे की जरूरत नहीं लेकिन ये जो योजना वो सरकार की तरफ से है इसलिए यहाँ पर आपकी भागेदारी बनती है और इसका लाभ लेना ही चाहिये ।
🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚
ग्राम भरनाकलां
मेरा गांव मेरा गर्व, ब्लॉग संख्या - १०
ग्राम पंचायत भरनाकलां में तीन थोक (सेक्टर्स) में विभाजित है और गांव के अतिरिक्त नहर पार दो छोटे नगले भी हैं।
🕰️ग्रामप्रधानी कालक्रम
10+6+5+5+5=31 वर्ष (10 विसा)
5+5+5+5 =20 वर्ष (ढाई विसा)
5 +5 वर्ष (सवा विसा)
5 वर्ष ( नगला)
दश विसा- 5 बार
ढाई विसा- 3
सवा विसा- 2
नगला- 1
🔹ग्राम भरनाकलां के ग्राम प्रधानों के नाम -
12- Raju Pal ji ( 2025- 2020) (दश विसा)
11- Ganpat ji's (Wife )(2015- 2010) (दश विसा)
10- Padma Sharma ji (2015-2010) ( सवा विसा)
9- Narayan Das Thakur ji (2010-2005) ( ढाई विसा)
8- Late Girraj Kohali ji (2005-2000) (नगला)
7- Shobharam Sharma Ji (2000-1995) (सवा विसा)
6- Late Satyadev Sharma ji 1995-1989) (दश विसा)
5- Late Brahmanand Sharma ji (1989-1984) (दश विसा)
4- Late Birju Prasad Sharma ji (1984-1974) (दश विसा)
3- Late Keshiram Sharma ji (1974-1969) (ढाई विसा)
2- Late Pyare Lal Gupta ji (1959-1964) (ढाई विसा)
1- Late Shoni Singh ji (1964-1959) (सवा विसा)
🙏 पंचवर्षीय कालखंड थोड़ा बहुत इधर- उधर हो सकता है।
.......................................................................
🔹वर्तमान में ग्राम भरनाकलां प्रधान - (गत ग्राम प्रधानी काल)
ब्लॉक- चौमुहाँ
ग्राम पंचायत - भरनाकलां
पद का आरक्षण - अन्य पिछड़ा वर्ग (obc)
नाम - राजेन्द्र s/o श्री लच्छो
उम्मीदवार की जाति/वर्ग - अन्य पिछडा वर्ग
शैक्षिक योग्यता - 10th
लिंग- पुरुष
उम्र - 42
प्राप्त वैध मत- 1063
प्राप्त मत %- 67.92
मतदान प्रतिशत - 69.59
परिणाम - सविरोध जीत
* भरनाकलां के राजनैतिक इतिहास में पिछली पंचवर्षी में पहली बार बघेल समाज से उम्मीदवार जीता था इससे पहले इस समाज से तीन उम्मीदवार ग्राम पंचायत चुनाव हार चुके हैं ।
* भरनाकलां के इतिहास में पहली बार पिछली पंचवर्षी में प्रजापति समाज (कुम्भकार समाज) ने चुनाव में अपना प्रत्याशी उतारा था ।
* अभी तक गांव भरनाकलां के इतिहास में एक ही परिवार से 2 बार ग्राम प्रधान के रूप में लोग चुन चुके हैं।
* गाँव के इतिहास में जीत की हैट्रिक केवल *दश विसा* थोक ने लगायी है ।
ग्राम पंचायत (ग्राम परिषद ) भारतीय गांवों में एक बुनियादी शासी संस्था है। यह एक राजनीतिक संस्था है, जो किसी गांव या गांवों के समूह की कैबिनेट के रूप में कार्य करती है। ग्राम सभा/ ग्राम पंचायत के सामान्य निकाय के रूप में कार्य करती है। ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव सीधे लोगों द्वारा किया जाता है। ग्राम पंचायत का नेतृत्व एक निर्वाचित अध्यक्ष और उपाध्यक्ष करते हैं, जिनकी सहायता के लिए एक सचिव होता है जो पंचायत के प्रशासनिक प्रमुख के रूप में कार्य करता है। उत्तर भारत में ग्राम पंचायत के अध्यक्ष को "प्रधान" या " सरपंच " के रूप में जाना जाता है । भारत में लगभग 2.5 लाख ग्राम पंचायतें मौजूद हैं।
भारत के विभिन्न राज्यों में स्थापित पंचायत राज व्यवस्था के तीन स्तर हैं:-
जिला स्तर पर जिला परिषद
ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति
गांव स्तर पर ग्राम पंचायत
राजस्थान ग्राम पंचायत स्थापित करने वाला पहला राज्य था, बगदरी गाँव (नागौर जिला) पहला गाँव था जहाँ 2 अक्टूबर 1959 को ग्राम पंचायत की स्थापना की गई थी।
✍️ सरपंच को भारत के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है-
⚕️ग्राम प्रधान - उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, तथा हरियाणा, पंजाब के कुछ हिस्से।
⚕️सरपंच - राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, जम्मू और कश्मीर, पंजाब, मध्य प्रदेश, ओडिशा।
⚕️पंचायत अध्यक्ष - तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल।
⚕️मंडल प्रजा परिषद अध्यक्ष - आंध्र प्रदेश और तेलंगाना।
⚕️मुखिया- बिहार, झारखंड।
⚕️गांव पंचायत अध्यक्ष - असम।
🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚
गांव भरनाकलां ब्लॉग संख्या- १२
*मेरा गांव मेरा गर्व *
एक राष्ट्र की असली ताकत उसके सैनिकों के समर्पण में होती है । असीम साहस और निस्वार्थ भाव से देश की रक्षा और सेवा करने वाले उन बहादुर जवानों को प्रणाम करना चाहिए। भारतीय सेना की बहादुरी और बलिदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता ।
ऐसे ही एक वीर बलिदानी श्री कैप्टन राकेश शर्मा का जन्म 25 मई 1966 को उत्तर प्रदेश में मथुरा जिले के गांव भरनाकलां तहसील गोवर्धन हुआ था। भारतीय सेना के दिग्गज कैप्टन हरिहर शर्मा जी के बेटे, कैप्टन राकेश शर्मा ने अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा झांसी और बरेली से की। बाद में उन्होंने 05 जुलाई 1976 को छठी कक्षा में राजस्थान के मिलिट्री स्कूल धौलपुर में प्रवेश लिया। यहीं पर उनके भविष्य के सैन्य करियर की नींव रखी गई थी। बारहवीं कक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने पुणे से स्नातक की पढ़ाई की और अपना एनसीसी "सी" प्रमाणपत्र भी हासिल किया।
वर्ष 1986 में, उन्होंने NCC दल के हिस्से के रूप में गणतंत्र दिवस परेड में भाग लिया और उन्हें राष्ट्रपति द्वारा सर्वश्रेष्ठ कैडेट के रूप में सम्मानित किया गया। उनका बचपन से ही सशस्त्र बलों में शामिल होने का मन था और बड़े होकर अपने सपने का पालन करना जारी रखा। आखिरकार उनका सपना सच हो गया और स्नातक होने के बाद उन्हें सेना में शामिल होने के लिए चुना गया। वे आईएमए देहरादून गए और 23 वर्ष की आयु में 10 जून 1989 को लेफ्टिनेंट के रूप में पद प्राप्त किया। उन्हें मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री रेजिमेंट की 17 Mech Inf बटालियन में पद मिला, जो एक इन्फैंट्री रेजिमेंट है जो अपने निडर सैनिकों और कई युद्ध कारनामों के लिए जानी जाती है।
एक बार कश्मीर में आतंकी और और आतंकवाद को खत्म करने के लिए पोस्टिंग हुई । संदिग्ध शिविर लगभग 11000 फीट की ऊंचाई पर स्थित था। कैप्टन राकेश शर्मा ने एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करते हुए फीचर को स्केल करने का फैसला किया जिसने आश्चर्य का एक तत्व सुनिश्चित किया। कैप्टन राकेश शर्मा ने 04 मार्च 1995 की सुबह एक अधिकारी, 4 जेसीओ और 65 अन्य रैंकों की एक टीम का नेतृत्व करते हुए ऑपरेशन शुरू किया। कैप्टन राकेश शर्मा और उनके आदमियों ने अचंभित करने में कामयाबी हासिल की और इलाके की घेराबंदी कर दी। चेतावनी जारी करने पर, जब आतंकवादियों ने आत्मसमर्पण नहीं किया, तो एक भीषण गोलीबारी शुरू हो गई। हालांकि एक आक्रामक हमले के बाद बड़ी संख्या में आतंकवादियों ने अंततः आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद कैप्टन राकेश शर्मा ने बचे हुए तत्वों से निपटने के लिए मॉपअप ऑपरेशन के लिए कैंप में प्रवेश किया। वह जल्द ही दो छिपे हुए आतंकवादियों के हमले की चपेट में आ गये, जिन्होंने अपने स्वचालित हथियारों से उस पर गोलीबारी की। कैप्टन राकेश शर्मा तुरंत हरकत में आए और उनमें से एक का सफाया कर दिया और दूसरे को घायल कर दिया। हालांकि दूसरा आतंकी पलटने में कामयाब रहा और कैप्टन राकेश शर्मा को गोली मार दी। साथ ही 7 विदेशी खूखार आतंकवादियों को मौत के घाट उतार कर माँ भारती की रक्षार्थ बलिदान देने में भी पीछे नहीं हटे। कैप्टन राकेश शर्मा गंभीर रूप से घायल हो गए और बाद में उन्होंने दम तोड़ दिया। कैप्टन राकेश शर्मा एक बहादुर सैनिक और शूरवीर अधिकारी थे, जिन्होंने भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं का पालन करते हुए अपने कर्तव्य की पंक्ति में 28 वर्ष की आयु में आगे बढ़कर नेतृत्व किया और अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। कैप्टन राकेश शर्मा को उनके असाधारण साहस, नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए महामहिम राष्ट्रपति महोदय द्वारा वीरता सम्मान, "शौर्य चक्र" दिया गया। भारतीय सैनिक अपनी आखिरी सांस तक लड़ते हैं, इसलिए नहीं कि वे अपने सामने वालों से घृणा करते हैं बल्कि इसलिए क्योंकि वे अपने पीछे खड़े लोगों से प्यार करते हैं ।
तू शहीद हुआ,
तो न जाने,
कैसे तेरी माँ सोयी होगी?
लेकिन एक बात तो तय है कि ...
तुझे लगने वाली गोली भी,
सौ बार रोयी होगी !
अपने गांव भरनाकलां में मां भारती के ऐसे सपूत कैप्टन राकेश शर्मा जी को समर्पित शहीद स्मारक बनाया गया है जहां जिले अन्य सभी शहीदों के नाम भी पट्टिका पर अंकित हैं। आज देश के युवाओं के लिए वो एक प्रेरणास्त्रोत हैं।
उत्तर प्रदेश की पूज्य योगी जी की सरकार ने
27 कि0 मी0 गोवर्धन-छाता सडक का नामकरण शौर्यचक्र विजेता शहीद कैप्टन राकेश शर्मा जी के नाम से कर के बृजभूमि व स्वसमाज को गौरवान्वित किया है ।
बलिदानियों के नाम से उनके सम्मान में गांव का मुख्य द्वार "वीर द्वार" भी बनवाया जाए तो और अच्छा है।
🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚
मेरा गांव मेरा गर्व:
भरनाकलां ब्लॉग संख्या- १२
गांव भरनाकलां में पोस्ट ऑफिस भी है जहां से डाक द्वारा पत्र, मनीऑर्डर, ग्रीटिंग कार्ड, पार्सल आदि को डाकिया के हाथों घर तक पहुंचाया जाता है। गांव के तीन सेक्टर्स (दश विसा, सवा विसा, ढाई विसा) में से यह ढाई विसा के अंतर्गत आता है। भरनाकलां में डाकघर की व्यवस्था सन....... में हुई थी। सबसे पहले डाकिया रूप में.......को तैनात किया गया था। तब से लेकर आज तक सुचारू रूप से डाकघर भरनाकलां अपनी सेवाएं देता आ रहा है। गांव में भरनाकलां में लगभग हर तरह की सुविधाएं हैं। आजकल बैंक प्रणाली होने के कारण यह सिर्फ पत्राचार तक सिमट कर रह गया है।
डाकिया को मूल रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान पर इन दस्तावेजों को पहुंचाना होता है। ऐसा करने के लिए वह घर-घर और गली-गली जाता है क्योंकि वह एक लोक सेवक होता है। डाक विभाग, जिसे "इंडिया पोस्ट" कहा जाता है, एक वैधानिक संस्था है जिसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। यह संचार मंत्रालय के अधीन है । दुनिया में सबसे व्यापक रूप से वितरित डाक प्रणाली है, सबसे अधिक डाकघर भारत में हैं। डाक क्षेत्र के आधारानुसार देश को 23 डाक सर्किलों में विभाजित किया गया है, प्रत्येक सर्किल का नेतृत्व एक मुख्य पोस्टमास्टर जनरल करता है । पोस्टल इंडेक्स नंबर (पिन कोड) छह अंकों का पोस्टल कोड होता है । पिन सिस्टम श्रीराम भीकाजी वेलंकर द्वारा बनाया गया था जब वे कोलकाता में सेवारत थे।
🔹पिन प्रणाली निम्नलिखित तरीके से व्यवस्थित है:-
पहला अंक क्षेत्र को इंगित करता है।
पहले दो अंक उप-क्षेत्र (या डाक सर्किल) को दर्शाते हैं।
पहले तीन अंक छंटाई जिले को दर्शाते हैं।
पहले चार अंक सेवा मार्ग को दर्शाते हैं।
अंतिम दो अंक डिलीवरी डाकघर को दर्शाते हैं। 2014 तक, भारत में 154,725 डाकघरों को कवर करने वाले कुल 19,101 पिन हैं। भारत में प्रत्येक पते के लिए 10 अंकों की विशिष्ट पहचान संख्या प्रस्तावित की है जिसे डिजीपिन कहा जाता है । राष्ट्रीय डाक टिकट संग्रहालय का उद्घाटन 6 जुलाई 1968 को नई दिल्ली में हुआ था।
🔸अन्य डाक सेवाएं:-
डाक प्राप्ति के लिए पोस्ट बॉक्स और पोस्ट बैग
स्पीड पोस्ट
निवास प्रमाण के लिए पहचान पत्र
इंडिया पोस्ट एटीएम
आरएमएस ( रेलवे मेल सेवा )
डाकघर पासपोर्ट सेवा केंद्र (POPSK)
आधार नामांकन एवं अद्यतनीकरण।
वेस्टर्न यूनियन.
डाक जीवन बीमा और ग्रामीण डाक जीवन बीमा।
बचत बैंक (एसबी/आरडी/टीडी/एमआईएस/एससीएसएस/पीपीएफ/एसएसए)
बचत नकद प्रमाण पत्र.
इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक (आईपीपीबी)।
स्टाम्प बिक्री ।
🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚
ग्राम भरनाकलां में कैसी सुविधाएं हों (मानसिक भाव)
मेरा गांव मेरा गर्व:- ब्लॉग संख्या १३
▪️देश की सभी पंचायतों के लिए अब मास्टर प्लान बनाने की तैयारी की जा रही है । केंद्र सरकार ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री गिरिराज सिंह के अनुसार मास्टर प्लान ( महायोजना ) में पंचायत स्तरीय स्थानीय बुनियादी ढांचे, विकासात्मक आवश्यकताओं और रोजगार का बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा।
देश भर में २.५ लाख के करीब ग्राम पंचायत हैं जिनके अंतर्गत करीब ६ लाख गांव आते हैं। मास्टर प्लान एक वैधानिक योजना दस्तावेज है, जो निर्धारित नियोजन क्षेत्र के अंतर्गत भविष्य की सुविधाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए तैयार किया जाता है। मास्टर प्लान की वैधता एक विशिष्ट अवधि के लिए होती है और अवधि समाप्त होने के बाद इसमें संशोधन की आवश्यकता होती है ।
✍️ एक ग्राम पंचायत में क्या- क्या सुविधाएं होनी चाहिए और किस प्रकार इन सुविधाओं को जन- जन तक पहुंचाया जा सकता है?
1:- वर्तमान समय में बजट, किस योजना के लिए सरकार द्वारा गाँव के विकास हेतु दिया गया है इसका लेखाजोखा मासिक/त्रिमासिक या योजना समाप्ति के बाद पारदर्शी रूप से ग्राम पंचायत द्वारा गाँव के समक्ष रखा जाए ।
2:- सरकार द्वारा दिए गए धन से गाँव भरनाकलां गांव में कौन-कौनसे काम ५ वर्ष के अंतर्गत सरकार से प्राप्त धन के द्वारा किये जाने हैं उनका भी मास्टर प्लान सबके सामने रखा जाए l
3:- गांव में बिना टॉएलेट के एक भी घर अछूता नहीं हो ।
5:- अपने गांव भरनाकलां में प्रधानमंत्री ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत कितने आदमी काम कर रहे हैं उन सभी मजदूरों के नाम की पारदर्शिता हो ।
6:- ग्राम भरनाकलां में दिव्यांगों, वृद्धावस्था और विधवा महिलाओं पैंशन की व्यवस्था हो।
7:- ग्राम भरनाकलां में सरकार द्वारा आवंटित धन से इंटर लॉकिंग सड़कों का निर्माण हर गली-मोहल्ले में किया जाये ।
8:- स्कूल-फ़ार्म की जगह का प्रयोग गाँव के बच्चों के लिए किया जाए जिसमें जिम, बैठने की सीट व पेड़-पौधे लगाये जायें ।
9:- श्मशानघाट की बाउंड्री वाले भूखंड के अतिरिक्त दूसरे भूखंड पर शांतिवन का निर्माण भी कराया जाए ।
10:- गांव के चारों दिशाओं में स्थित चारों तालाबों की खुदाई, सफ़ाई व बाउंड्रीवाल का निर्माण गांव विकास की प्राथमिकता में शामिल हो ।
11- ग्राम पंचायत भवन में साप्ताहिक मीटिंग की व्यवस्था हो।
12:- समय - समय पर जागरूकता के लिए नुक्कड़ नाटकीय मंचों का कार्यक्रम कराया जाये ।
12- राशन-वितरण प्रणाली को प्रत्यक्ष रूप से सभी लोगों में बिना किसी भेदभाव के बांटा जाये।
13:- एक सार्वजनिक कंप्यूटर प्रयोगशाला व पुस्तकालय, मिनी संग्रहालय की व्यवस्था सम्पूर्ण ग्रामवासियों के ललिए शुरु की जाए ।
14:- ग्रामवासियों के लिए परिक्रमा मार्ग को सीसी रोड व रात्रि प्रकाश के लिए हर लट्ठे पर स्ट्रीटलाइट का इंतजाम करवाया जाए ।
15:- गांव में एम्बुलेंस सेवा की व्यवस्था भी हो।
16:- सरकारी ग्राम्य अस्पताल में नियमित डॉक्टरों की उपलब्धता हो ।
17:- किसान भाइयों के लिए फसल हेतु बीज, खाद व कीटनाशक खरीददारी हेतु गांव स्थित सरकारी भवन "खाद व बीज भण्डार गृह" पर ही उपलब्ध हो।
18:- पर्वानुसार बसों के माध्यम से बड़े है बुजुर्गों अथवा भक्तों के तीर्थदर्शन की भी व्यवस्था हो सकती है।
👉गांव का जीवन शहरों से ज़्यादा मधुरमय होता है, पांच कारक जो कि महत्वपूर्ण हैं- स्वास्थ्य , शिक्षा, पेयजल, आवास तथा सड़कें। गांव सभी के लिए शांति, प्राकृतिक सौंदर्यता का एक ऐसा स्थान है जहां हर कोई अपने जीवन की सादगी और प्यार भरे रिश्तों का अनुभव कर सकता है। गांव के लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में साझेदार बनते हैं, जिससे दिलों में अपनापन बढ़ता है। प्रदूषण का स्तर कम होने तथा हानिकारक गैसों का उत्सर्जन न होने के कारण हवा शुद्ध और ताज़ा रहती है ।
गाँवों में रहने वाले लोग ज़्यादातर अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए खेतों में जाते हैं , वे आम तौर पर मेहनती होते हैं और उनका दिन शहरों या कस्बों में रहने वाले ज़्यादातर लोगों की तुलना में बहुत जल्दी शुरू होता है। वे पूरे दिन खेतों में कड़ी मेहनत करते हैं । गांव के लोगों के जीवन यापन का मुख्य आधार कृषि ही है, लेकिन अब परिवार के लड़के नौकरी व्यवसाय आदि भी करते हैं जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी हो रही है।
ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा
संबंधित लिंक...






























