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Tuesday, May 19, 2020

Thakur Shri Bihari Ji Mandir Bharanakalan

बिहारी जी मंदिर का इतिहास-

हिन्दुओं के उपासनास्थल को मन्दिर कहते हैं। यह अराधना और पूजा-अर्चना के लिए निश्चित की हुई जगह या देवस्थान है। यानी जिस जगह किसी आराध्य देव के प्रति ध्यान या चिंतन किया जाए या वहां मूर्ति इत्यादि रखकर पूजा-अर्चना की जाए उसे मन्दिर कहते हैं। मन्दिर का शाब्दिक अर्थ 'घर' है। वस्तुतः सही शब्द 'देवमन्दिर', 'शिवमन्दिर', 'कालीमन्दिर' आदि हैं।
                    मंदिर में विराजमान बिहारी जी
वृंदावन में बांके बिहारी और भरनाकलां में "ठाकुर श्री बिहारी जी महाराज" प्रसिद्ध हैं।

लगभग 500 वर्ष पुरातन श्री बिहारी जी मंदिर का निर्माण भरनाकलां ग्राम वासियों द्वारा करवाया गया था। मंदिर पुराने होने के सबसे बड़ा साक्ष्य मंदिर के जगा (पुराने समय में बहीखाते में सूचना एकत्रित करने वालेलोग) हैं । वो अलवर राजस्थान से आते थे । मंदिर में श्री बिहारी जी महाराज विराजमान हैं उनके मूर्ति स्वरूप को उनके निजधाम वृन्दावन से लाया गया था, हाल ही में मंदिर का पुनर्निर्माण "मंदिर कमेटी" की देखरेख में कराया गया है। सम्पूर्ण ठाकुर द्वारे का जीर्णोद्धार किया गया है । वर्तमान में लॉकडाउन के समय मंदिर के चारों ओर नई बाउंड्री वॉल बनाई गई है । मंदिर का सारा खर्चा मंदिर की खेतीहर भूमि से प्राप्त पट्टे की राशि से मंदिर कमेटी द्वारा (मंदिर ट्रस्ट)  उठाया गया है । मंदिर के लिए एक ट्रस्ट बनाने के प्रस्ताव पर बातचीत जारी है । उसके 40 सदस्यों को चिन्हित कर लिया गया है । कोषाध्यक्ष व प्रधान प्रबंधक का चयन किया जा चुका है ।

वास्तुकला श्री बांके बिहारी जी का मंदिर बहुत ही सुन्दर सफेद संगमरमर से बना हुआ है। मन्दिर का प्रवेश द्वार बहुत ही आकर्षक और शानदार है। मंदिर में 2 दिशाओं में ठाकुर जी विराजमान हैं मुख्य द्वार में प्रवेश करने के बाद, एक आयताकार आँगन आता है सामने ही ठाकुरजी का दरबार है और और बाएं हाथ की तरफ काली माता का दरबार है ।  मंदिर के आँगन में तुलसी का थंबूला है । मन्दिर के बाहर प्रांगण में देवताओं व महंतों के पदचिन्ह  हैं। मंदिर के बाहरी और आंतरिक दीवारों को मंदिर के आकर्षण और प्रभाव के लिए सुंदर नक्काशियों और चित्रों से सजाया गया है। ठाकुर द्वार के दांयी ओर महर्षि सौभरि जी की मूर्ति विराजमान है ।
इस मंदिर के पुनर्निर्माण में अनेक महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखा गया है। सर्वप्रथम इसकी भव्यता को ही आधार बनाकर  मंदिर को विशाल रूप में निर्मित किया गया है जिसमें उसका शिल्प सौंदर्य सभी को प्रभावित करता है।

कृषि भूमि-  मंदिर के नाम 22 बीघा जमीन है । 18 बीघा भूमि लीडो बम्बी पर स्थित है और 4 बीघा मंदिर के सामने । सिंचाई के लिए दोनों जगह भरतपुर फीडर बम्बे से पाइप लाइन डली हुई है । 18 बीघा वाली भूमि पर बिजली से सिंचाई की जाती है । सन 2020 के लिए (1 साल के लिए) 550000 में पट्टे स्वरूप खेत को दिया गया है ।

मंदिर महंत- वर्तमान में मंदिर के महंत श्री नंदराम बाबा हैं । इनसे  पहले पहले श्री गोविंद दास बाबा मंदिर के महंत हुआ करते थे उनके देहांत के बाद श्री नंदराम बाबा को उनका उत्तराधिकारी बनाया गया था । मंदिर के महंतों की सूची इस प्रकार है- सेवादास, मौनी बाबा, बालकदास । इनसे पहले भी जो मंंडीर महंत हुए हैं उनकी समाधियां मन्दिर केे दाहिने भाग की ओर बनी हुई हैं ।
 पहले मन्दिर की खेती को आधे-बांटे पर दिया जाता था । उस समय मन्दिर में दूध के लिए कुछ गाय-भैंसों को भी रखा जाता था। उनकी सेवा के लिए एक विशेष सेवादार भी हुआ करता था । मंदिर की भूमि से आने वाली कमाई को कुछ साल तक महंत बालकदास ने अपने कब्जे में रखा वो एक-आध बार गाँव आते थे , गांव वालों ने विरोध जताकर उनसे महंत की गद्दी छीन ली और अन्य को महंत बना दिया । वैसे महंत सौभरि ब्राह्मण समाज से ही रहे हैं सिर्फ श्री बालकनाथ इस परंपरा का अपवाद हैं । महंत 4 बजे प्रातः शंख बजाकर ठाकुर जी को निंद्रा से उठाते हैं । औऱ लोगों द्वारा मनाये जाने वाले व्रत त्यौहार की सूचना जांरी करते हुए महंत माइक में आवाज लगाते हैं । फिर 5 बजे ठाकुर जी की आरती होती है ।

मंदिर पर अब तक के महंतो की लिस्ट -

शिक्षा गृह- मंदिर के सामने ही श्री बांके बिहारी शिशु मंदिर बना हुआ था, उसमें बहुत दिनों तक पठन पाठन हुआ, यह RSS वालों का स्कूल था, यहाँ बच्चों की शाखा लगवाई जाती थी, स्कूल की पढ़ाई की शुरुआत सदाचार की प्रथम वेला से होती थी, 26 जनवरी व 15 अगस्त को बालकों के कार्यक्रम का मंचन होता था, RSS शिक्षा आयोग से आचार्यों की नियुक्ति की जाती थी लेकिन अब उसको भी तुड़वाकर इसी वर्ष 2020 में मंदिर की बाउंड्री वॉल के अंदर ले लिया गया है । कक्षा आठवीं तक चलने वाले स्कूल में कभी प्रतियोगिताओं का दौर हुआ करता था, बाहर के स्कूलों के बच्चे आया करते थे । स्कूल में आसपास के गाँवों के बच्चे भी आया करते थे ।



मुहारी कुंड- मन्दिर के पास स्थित तालाब को मुहारी के नाम से जाना जाता है । इसमें जल भरने की व्यवस्था बम्बे के जल से नाले द्वारा की जाती है । अभी इसके बाउंड्री वॉल का काम अधूरा है । कुंड के किनारे दो बड़े घाट बने हुए हैं । कभी इसी कुंड में  सभी गांव वाले लोग अपने पशुओं को जल पिलाने यहीं लाया करते थे । कार्तिक मास में नहाने वाले भक्त एक महीने तक इसी कुण्ड में 4 बजे भोरकाल में गोता लगाते थे ।
 लेकिन अब कोई नहीं नहाता, सिर्फ 4-6 पालतू बतखों के अतिरिक्त । भक्त लोग तालाब की मछलियों के लिए आटे की गोलियां या चावल के दाने हर रोज आया करते हैं । गांव वासियों के लिए पानी की व्यवस्था के लिए पानी की सरकारी टंकी का निर्माण भी मन्दिर की भूमि पर ही किया गया है । मंदिर के चारों ओर परिक्रमा मार्ग बना हुआ है और सरोवर के किनारे ग्रामवासियों के पूर्वज देवतारूप में जिन्हें थान बाबा के नाम से पुकारा जाता है, वो बने हुए हैं ।

ग्राम पर्व- मन्दिर में श्रावण मास में  हरयाली तीज व रक्षा बंधन वाले दिन सम्पूर्ण ग्राम वासी सब एकत्रित होकर खेलकूद का आयोजन करते हैं । कबड्डी का आयोजन सबसे आकर्षण वाला प्रतीत होता है । दोनों दिन घेवर जो कि ब्रज की प्रसिद्ध मिठाई है उसको सभी में वितरित किया जाता है।


★इसके 8 दिन बाद कृष्णजन्माष्टमी पर लोग फिर इकट्ठा होते हैं और श्री बाँके बिहारी जी का दर्शन करते हैं । बिहारी जी हरियाली तीज से जन्माष्टमी तक झूला झूलते हैं । जन्माष्टमी से अगले दिन सभी ग्रामवासी अपना व्रत खोलने के लिए पंजीरी का प्रसाद लेने आते हैं ।
★मंदिर का तीसरा बड़ा उत्सव शरद पूर्णिमा को होता है । मंदिर में सभी ग्रामवासियों के लिए खीर का प्रसाद वितरित किया जाता है । इस दिन सभी ग्राम वासी पूरे गाँव की परिक्रमा मंदिर से होते हुए लगाते हैं ।
★मंदिर में मनाये जाने वालों में चौथा त्यौहार होली है । पूरे गाँव की फेरी लगाने के बाद मन्दिर प्रांगण में पट्टेबाजी का खेल होता है और झांकियां निकाली जाती हैं ।
मंदिर के महंत का काम ठाकुर सेवा के अलावा जितने भी गाँव के लड़कों के शादियां होती हैं उनको कंठी पहनाकर गुरुमंत्र देना । मंदिर भवन के पीछे पेड़-पौधे भी हैं ।
तालाब किनारे एक शिवालय भी है । घाट के किनारे नहाने के लिए एक छोटी सी कुइया का भी है ।

★ बसंतपंचमी के दिन ज्यादातर ग्रामवासी होली के शुभारंभ अवसर पर मंदिर के महंत के साथ बसंती रंग से होली खेलते हैं । ब्रजमंडल में बसंत पंचमी से रंगपंचमी (चैत्र मास की कृष्ण पंचमी) ।

पुस्तकालय व गौशाला का निर्माण- हुआ नही निर्माण, हो सकता है ।

ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा

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