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Tuesday, October 22, 2019

ग्राम पंचायत के लिए बजट क्यों आवश्यक है?

पंचायत बजट क्या है?

पंचायतों के लिए बजट उसके एक वित्तीय वर्ष के कार्यक्रम का दस्तावेज होता है। यह एक ऐसा प्रस्ताव होता है जिसमें एक वित्तीय वर्ष में विभिन्न मदों पर होने वाले व्यय तथा वित्त उपलब्ध कराने वाले साधनों की विवरणी होती है। 

पंचायत के लिए बजट क्यों आवश्यक है?

प्रत्येक पंचायत को प्रभावशाली रूप में काम करने तथा अपने दायित्वों एवं कर्तव्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक संसाधन की जरूरत होती है। इस प्रकार संसाधन को जुटाने एवं अपने व्ययों को पूरा करने के लिए पंचायत को बजट तैयार करना आवश्यक होता है।

बजट से पंचायत को क्या लाभ है?

बजट से पंचायत को निम्नवत लाभ होता है :

1. पंचायतों को आर्थिक नीतियों को पालन करने में सहूलियत होती है।
2. उनका आर्थिक स्थिति आसानी से मालूम हो जाता है।
3. पंचायत में संभावित आर्थिक विकास का अनुमान भी बजट से लगाया जा सकता है।
4. पिछले वर्ष में प्राप्त आय एवं किए गए व्यय का वास्तविक स्थिति का पता चलता है।
5. अगामी वर्ष में प्राप्त होने वाले आय एवं होने वाले व्यय का अनुमान लग जाता है।
6. पंचायत में कार्यान्वित योजनाओं एवं कार्यक्रमों का प्रगति मालूम होता है।
7. कर लगाने में सहूलियत होती है।
8. पंचायत को अपना कार्य करने में सहयोग मिलता है।
9. पंचायतों को अपना राजस्व जुटाने में आसानी हो जाता है।
10. आय-व्यय घटाने एवं बढ़ाने में सहयोग मिलता है।

बजट किस अवधि के लिए बनाया जाता है?

वर्तमान में वित्तीय वर्ष पहली अप्रैल से 31 मार्च तक की अवधि ही प्रचलन में है तथा इसी अवधि के लिए बजट बनाने का प्रावधान है और बनाया जाता है।

बजट के घटक या अवयव:-

सामान्यत: किसी भी बजट के दो मुख्य घटक होते है, पहला प्राप्तियां और दूसरा व्यय। 
(अ) प्राप्तियां -  इसमें एक वित्तीय वर्ष में विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होने वाले आय को रखा जाता है। उल्लेखनीय है कि पंचायतों को वर्तमान में अपना कोई आय का स्रोत नहीं है, उन्हें केंद्र या राज्य सरकार द्वारा फंड प्राप्त हो रहे है। वर्तमान में पंचायत को चार स्रोतों से वित्तीय सहायता प्राप्त हो रहे हैं।

1. पिछड़ा क्षेत्र अनुदान फंड (बीआरजीएफ)
2. तेरहवीं वित आयोग
3. चर्तुथ राज्य वित आयोग
4. मनरेगा।

संवैधानिक प्रावधान क्या है?

संविधान के अनुच्छेद 40 में भी पंचायतों के शक्तियां एवं अधिकार का उल्लेख है जिसमें पंचायतों को सौपें गए 29 कार्यों में से वार्षिक बजट बनाना एक मुख्य कार्य है। ग्राम पंचायत द्वारा बनाए जाने वाले वार्षिक बजट पर विचार-विमर्श कर सिफारिश करना ग्राम सभा का कार्य निर्धारित किया गया है। 

पंचायत के बजट में निम्नवत मुख्य होते है-

1. इसमें विगत वर्ष के वास्तविक आय और व्यय का पुनरावलोकन होता है।
2. वर्तमान वर्ष के लिए आय और व्यय का प्राक्कलन होता है।
3. अगामी वर्ष के लिए आवश्यकताओं के पूरा करने का प्रावधान होता है।

उल्लेखनीय है कि बजट प्राक्कलन में राजस्व व्यय, पूंजी व्यय और ऋण पर होने वाले व्यय को अलग-अलग प्रदर्शित किया जाता है।

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बजट बनाना एक तकनीक है- 

बजट बनाने के लिए ग्रामसभा को तकनीकी पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए। बजट को दो भागों में बांटना चाहिए। पहला राजस्व व्यय और दूसरा पूंजीगत व्यय।

राजस्व व्यय : चालू व्ययों को पूरा करने के लिए किए जाने वाले व्यय तथा विकास कार्यों पर होने वाले व्यय को राजस्व व्यय में शामिल किया जाता है। इसमें पंचायत द्वारा निम्नवत मद पर किए गए व्यय को शामिल किया जाना चाहिए-

1. सरकारी सेवाओं पर होने व्यय।
2. सब्सिडी पर व्यय।
3. ब्याज पर किया गया व्यय।
4. सामाजिक एवं सामूहिक सेवाओं पर किया गया व्यय।
5. कृषि एवं सिंचाई पर व्यय।
6. विद्युत पर व्यय।
7. सूखाराधन एवं बाढ़ नियंत्रण आदि पर व्यय।
8. मनरेगा योजना के तहत इन कार्यों पर किए गए व्यय को राजस्व व्यय में सम्मिलित करना चाहिए।
9. जल सरंक्षण एवं जल संचय से संबंधित योजना।
10. सूखा से बचाव के लिए किया गए वनारोपण।
11. सिंचाई के लिए सूक्ष्म और लघु सिंचाई परियोजना सहित नहर निर्माण।
12. तालाब निर्माण।
13. भूमि विकास।
14. परंपरागत जल निकायों का जीर्णोंद्धार।
15. बाढ़ नियंत्रण एवं सुरक्षा परियोजनाएं।
16. कृषि से संबंधित कार्य जैसे एनइडीपी कंपोस्टिंग, वर्मी कंपोस्टिंग, जैव खाद आदि।
17. पशुधन संबंधी कार्य यथा मुर्गीपालन शेल्टर, बकरी शेल्टर, मवेशयों के लिए फर्श निर्माण, यूरीन टैंक एवं नाद का निर्माण आदि।
18. मत्स्य पालन संबंधी कार्य।

वर्तमान में ये सभी कार्य पंचायतों द्वारा किए जा रहे हैं। इसलिए बजट बनाते समय उन पर किए गए व्यय को राजस्व व्यय में दिखाया जाना चाहिए।

पूंजीगत व्यय: इसमें वैसे व्यय को सम्मिलित किया जाता है, जिससे कोई नयी परिसंपत्ति सृजित होती है तथा उसका लाभ कई वर्षों तक मिलता है। वर्तमान में पंचायत में बीआरजीएफ, मनरेगा, तेरहवीं वित एवं चर्तुथ राज्य वित आयोग के तहत स्थायी परिसंपतियों के सृजन के उद्देश्य से बड़े पैमाने पर कार्य कराए जा रहे हैं यथा। ये कार्य है-

1. आंगनबाड़ी केंद्र भवनों का निर्माण।
2. पंचायत सरकार भवनों एवं मनरेगा भवनों का निर्माण।
3. प्रखंड-सह-अंचल कार्यालय एवं आवासीय भनवनों का निर्माण तथा उनका रख-रखाव का कार्य।
4. खेल मैदानों का निर्माण।
5. व्यक्तिगत पारिवारिक शौचालय, विद्यालयी शौचालय, आंगनबाड़ी शौचालय का निर्माण।

आयोजना व्यय : कर्मचारियों का वेतन, पेंशन एवं भत्ता, कार्यालय पर किए गए व्यय, सामाजिक-आर्थिक एवं कल्याण से संबंधित योजनाओं पर किया गया व्यय।

गैर आयोजना व्यय: ब्याज की अदायगी, न्यायालय से संबंधित व्यय, प्राकृतिक आपदा के अवधि में किया गया व्यय।

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बजट के प्रकार-

पारंपरिक बजट: बजट के प्रारंभिक स्वरूप को पारंपरिक बजट कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य सरकारी व्ययों पर नियंत्रण करना होता है। विकास का स्वरूप क्या हो इसका उल्लेख नहीं रहता है। इस कारण वर्तमान इस प्रकार के बजट प्रचलन में नहीं है।

पंचायतों को बजट बनाते समय इन स्वरूपों में से अंतिम दो स्वरूपों को अपनाया जा सकता है। इससे पंचायत को विकास कार्यों से संबंधित रणनीति बनाने में सहूलियत होगी। उल्लेखनीय है कि बजट वर्तमान योजनाओं के नवीनीकरण और समीक्षा का मौका देता है ताकि सही दिशा में व्यय हो सके। अतएव पंचायतों को भी विकासात्मक स्वरूप को अपनाना चाहिए।निष्पादन बजट : जब कार्य या परिणाम या लक्ष्यों को प्राप्ति के आधार पर बजट बनाया जाता है ,तो उसे निष्पादन बजट कहा जाता है। इसमें आय-व्यय के लेखा-जोखा होने के साथ कार्य निष्पादन के मूल्यांकन का आधार बनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि प्रथम हूपर आयोग ने सर्वप्रथम 1949 में इस प्रकार के बजट की अनुशंसा की थी।

पूंजी बजट : इस प्रकार के बजट में केवल पूंजीगत प्राप्तियों एवं व्ययों को ही शामिल किया जाता है।

आउटकम बजट: इस प्रकार के बजट में भौतिक लक्ष्यों का निर्धारण गुणवत्ता को ध्यान में रख कर किया जाता है। कार्य निष्पादन हेतु निर्धारित राशि को सही समय, सही गुणवत्ता तथा सही मात्रा में उपलब्ध कराने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाती है, उल्लेखनीय है कि इस प्रकार के बजट सबसे पहले 2005 में बना था।

शून्य आधारित बजट: ऐसे बजट में प्रस्तावित व्ययों के प्रत्येक मदों को एक नई मद मानकर प्रदर्शित किया जाता है। अर्थात प्रत्येक मद को शून्य मान कर उसे मूल्यांकित किया जाता है तथा सभी योजनाओं एवं कार्यक्रमों का मूल्यांकन या समीक्षा गहनता से की जाती है। उल्लेखनीय है कि इस प्रकार के बजट की शुरुआत सर्वप्रथम 1986-87 के बजट से किया गया था।

जेंडर बजट: जब बजट को लिंग विशेष के आधार पर तैयार किया जाता है, तो उसे जेंडर बजट कहा जाता है। सामान्यत: इस प्रकार के बजट में महिलाओं के लिए अलग से रणनीति तैयार किया जाता है। उनके विकास, कल्याण और सशक्तीकरण से संबंधित योजनाओं एवं कार्यक्रमों के लिए एक निश्चित धन राशि की व्यवस्था की जाती है।

पंचायतों को बजट बनाते समय इन स्वरूपों में से अंतिम दो स्वरूपों को अपनाया जा सकता है। इससे पंचायत को विकास कार्यों से संबंधित रणनीति बनाने में सहूलियत होगी। उल्लेखनीय है कि बजट वर्तमान योजनाओं के नवीनीकरण और समीक्षा का मौका देता है ताकि सही दिशा में व्यय हो सके। अतएव पंचायतों को भी विकासात्मक स्वरूप को अपनाना चाहिए।

बजट का दृष्टिकोण स्पष्ट कर देना चाहिए त्रकर लगाने और वसूली के लिए नीति निर्धारित होनी चाहिए। हालांकि अभी कर का निर्धारण सरकार द्वारा किया जाता है।

बजट का दृष्टिकोण स्पष्ट कर देना चाहिए- 

1. कर लगाने और वसूली के लिए नीति निर्धारित होनी चाहिए। हालांकि अभी कर का निर्धारण सरकार द्वारा किया जाता है।
2. प्राथमिकताओं को सुनिश्चित कर लेनी चाहिए। इसके लिए आम जनता की आवश्यकता को ध्यान में रखना चाहिए।
3. बजट में सामाजिक-आर्थिक प्रक्षेत्र के अनुसार व्यय का प्रावधान करना चाहिए यथा कृषि, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि।
4. संविधान द्वारा प्रदत्त 29 विषयों को ध्यान में रखना चाहिए।
5. बजट का प्राक्कलन तैयार करते हेतु किसी लेखा या बजट के जानकार से अवगत हो लें।
6. संसाधन के मद्देनजर ही अगामी वर्षों के लिए आवश्यकताओं को पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिए।
7. ग्राम सभा में बजट पर अवश्य चर्चा की जाए।

बजट निर्माण में पंचायत के समक्ष चुनौतियां

1. ग्राम पंचायत को अपना बजट बनाने, उस पर चर्चा करने तथा उसे अनुमोदित करने के लिए प्रावधान है। वे अपना आय-व्यय का वाक आकलन कर सकती है। लेकिन पंचायत को बजट निर्माण के समक्ष कई चुनौतियां है, जिसके कारण यह व्यावहारिक रूप में अमल में नहीं है।
2. पंचायतों को कोई अपना आय का स्रोत नहीं है।
3. टैक्स लगाने एवं वसूलने के संबंध में नियमावली नहीं बनने से उन्हे इसे संबंध में अधिकार प्राप्त नहीं हो पाई है।
4. पंचायतों में राजस्व उगाही का साधन यथा हाट, बाजार, मेला वाहन स्टैंड आदि सीमित है, जिसके कारण आय को वे नहीं बढ़ा सकते है।
5. पंचायतों के पास वैसे कर्मियों की कमी है, जिनसे बजट का निर्माण कराया जा सके। हालांकि सरकार इस दिशा में प्रयासरत है।

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