भरनाकलां गांव का परिचय- Introduction of the Bharanakalan Village
भरनाकलां शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, भरना का मतलब है स्थापना और कलां शब्द फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है बड़ा । इस प्रकार भरनाकलां का अर्थ होता है बड़ी स्थापना या बड़ी बस्ती। जैसे छोटा भरना या भरनाखुर्द जिसका अर्थ है छोटी बसावट।
मूल नाम- भरनाकलां
ब्लॉक- चौमुहाँ
थाना-बरसाना
तहसील-गोवर्धन
जिला- मथुरा
संभाग/मंडल- आगरा
प्रदेश- उत्तरप्रदेश
देश -भारत
महाद्वीप-एशिया
भाषा-हिन्दी
मानक समय-IST(UTC+5:30)
समुद्र तल से ऊँचाई-184 मीटर
दूरभाष कोड़- 05662
विधानसभा क्षेत्र- छाता
लोकसभा क्षेत्र- मथुरा
जनसंख्या-4500
परिवार-450
साक्षरता-75%
जिला- मथुरा
संभाग/मंडल- आगरा
प्रदेश- उत्तरप्रदेश
देश -भारत
महाद्वीप-एशिया
भाषा-हिन्दी
मानक समय-IST(UTC+5:30)
समुद्र तल से ऊँचाई-184 मीटर
दूरभाष कोड़- 05662
विधानसभा क्षेत्र- छाता
लोकसभा क्षेत्र- मथुरा
जनसंख्या-4500
परिवार-450
साक्षरता-75%
बहुसंख्यक समाज - आदिगौड़ सौभरेय अहिवासी ब्राह्मण
स्कूल/कॉलेज- सरस्वती शिशु मंदिर, प्राइमरी विद्यालय, कैप्टन राकेश इंटर कॉलेज
बैंक- सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया
हॉस्पिटल-गवरमेंट अस्पताल
मंदिर- बाँके बिहारी मंदिर, राधाकृष्ण मंदिर
साप्ताहिक बाजार-शनि बाजार
भरनाकलां का मानचित्र: Map of Bharanakalan Village
यक्षमणिभद्र के मूर्ति -
पुराणों के अनुसार यक्षों का कार्य पापियों को विघ्न करना, उन्हें दुर्गति देना और साथ ही साथ अपने क्षेत्र का संरक्षण करना था। मथुरा संग्रहालय में इस प्रकार के यक्ष और यक्षणियों की छह प्रतिमाएं हैं, जिनमें "भरनाकलां से प्राप्त मूर्ति " भी शामिल है |यक्ष का पूजन उस समय बड़ा ही लोकप्रिय था।
:-राम बारात का दृश्य
भरनाकलां होली मेला दृश्य
विश्व के अन्य सभी देशों की तुलना में “भारत” वास्तव में आज भी गांवों का ही देश है। कला, संस्कृति, वेशभूषा के आधार पर आज भी ‘गांव’ देश की रीढ़ की हड्डी बने हुये हैं। प्रत्येक गांव का एक अपना ही महत्व होता है जिसका पता वहां रहने वाला ही जानता है।
गांव भरनाकलां भी भारत के लाखों गांवों जैसा ही है । लगभग साढ़े चार सौ घरों की इस बस्ती का गांव है भरनाकलां ! भरनाकलां गांव छाता-गोवर्धन रोड पर स्थित है । गांव के पूर्व में भरनाखुर्द, पश्चिम में ततारपुर, उत्तर में सहार, दक्षिण में पाली गांव स्थित है ।
गांव के तीनौं तरफ प्रमुख तालाब हैं इसके पूर्व में श्यामकुण्ड, पश्चिम में नधा, दक्षिण में मुहारी(मुहारवन) एवं उत्तर में समोंखरी(छोटा तालाब) है ।
गांव में बारात के ठहरने के लिए बारात घर की भी व्यवस्था है । गांव में खाद गोदाम भी है । पीने के स्वच्छ जल की व्यवस्था गांववासियों ने बिना सरकार की सहायता लिए बगैर,स्वयं यहाँ के लोगों व्यवस्थित की गई है । यहां के लोग हर क्षेत्र में कार्य करने में सक्षम होते जा रहे हैं।
अगर हम गांव की आबादी स्वसमाज के अनुसार देखते हैं तो करीब 50 प्रतिशत से ज्यादा की भागेदारी है और अपने समाज के गोत्र के हिसाब से यहाँ, नुक़्ते/वर्गला, ईटोंइयाँ, कुम्हेरिया, पचौरी, भुर्र्क, तगारे, परसैया आदि परिवार निवास करते हैं । गाँव के उत्तर में कलकल करती हुई आगरा नहर बहती है । चारों और खेतों की हरियाली गाँव की शोभा बढ़ाती है । पूर्व और दक्षिण में भरतपुर फीडर(बम्बा)और पश्चिम में खार्ज बम्बा कृषि सिंचाई की पूर्ति करता है। गाँव से थोड़ी दूरी पर एक बड़ा सा बाँकेबिहारी जी का मंदिर है जिसके पास मुहारवन तालाब है । पाठशाला और अस्पताल गाँव के बाहर है ।
गाँव के सभी वर्णों के लोग यहाँ रहते हैं । गाँव में अधिकतर किसान रहते है । गाँव में गेंहू, चना, मक्का, ज्वार, चावल, सरसों एवं गन्ने की उपज होती है । कुछ लोग भांग, तंबाखू का सेवन भी करते हैं अन्य जगहों की तुलना करने पर फिर भी मेरा गाँव अपने आप में अच्छा हैं । यहाँ प्रकर्ति की शोभा है, स्नेहभरे लोग हैं, धर्म की भावना है और मनुष्यता का प्रकाश है । रोजगार की वजह से दिल्ली की तरफ लोगों का पलायन बड़ी मात्रा में हो रहा है ।
हमारे गांव के पास से जो आगरा नहर बह रही है वह नहर नहीं उसे ‘जीवन की धारा’ कहिए, क्योंकि वह जहाँ-जहाँ भी वह पहुंची है, सूखे खेतों में नया जीवन लहलहा उठा है। बंजर भूमि भी सोना उगलने लगी है। जब हम घर-द्वार से दूर किसी नगर में या वहां से भी दूर परदेश में होते हैं तो भी अपना गांव स्वप्न बनकर हमारे ह्रदय में समाया रहता है, रह-रहकर उसका स्मरण तन मन में उत्तेजना भरता रहता है।
यहाँ की दो-तिहाई से अधिक जनसंख्या गांव में रहती है । आधे से अधिक लोगों का जीवन खेती पर निर्भर है इसलिए ‘गांवों के विकास’ के बिना देश का विकास किया जा सकता है, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता । गाँव के अंदर ही बैंक, एटीएम व डाकघर स्थित है । यहाँ पक्की सड़कें एवं बिजली की उत्तम उचित व्यवस्था है ।
होली, दीवाली, रक्षाबंधन, दशहरा , शरद पूर्णिमा बडे धूमधाम से मनाये जाते हैं विशेषकर होली का त्यौहार बड़े ही हर्ष-उल्लास के साथ सब ग्रामवासी मिलकर मनाते हैं । रंगवाली होली जिसे धुलैंडी बोलते हैं उसी दिन गाँव का मेला होता है । मेले वाले दिन सभी नाते- रिश्तेदार अपने-अपने रिश्तेदारों के यहाँ आते हैं । उस दिन गांव में दिन निकलते ही होली का खेल शुरू हो जाता है । सब लोग हाथों में रंग, गुलाल लिए घरों से बाहर निकल कर सभी लोगों को रंग लगाते हैं और DJ और बाजे के साथ गांव की पूरी परिक्रमा करते हैं । ये एक जुलूस की तरह होता है । ये जुलूस होली के उत्सव में चार चांद लगा देता है । यह एकता का प्रतीक है । इसमें सभी धर्म-जाति के लोग होते हैं ।
🌻क्षेत्रफल के हिसाब से वैसे गांव ‘तीन थोक’ में बँटा हुआ है, मेले की फेरी की शुरुआत 10 विसा के "रामलीला स्थान" से होती है । इसके बाद फेरी ‘पौठा चौक’ से होते हुए ‘कुम्हरघड़ा हवा’ की ओर बढ़ती है । इसके बाद 2.5 विसा की तरफ बढ़ते हैं जो कि ‘ईटोइयाँ परिवारों’ को रंग लगाते हुए आगे बढ़ते हुए शोभाराम प्रधान जी के घर के सामने लोग भांग का भोग लेते हैं ।
विश्राम लेने के बाद आगे बढ़ते हुए ‘कुम्हेरिया परिवारों’ की तरफ होते हुए 1.25 विसा में प्रवेश करते हैं, यहीं एक छोटा सा मंदिर भी है, सब लोग ठाकुर जी को रंग लगाते हैं । यहाँ आकर सारे ग्रामवासी ‘तीनों थोकौं के लोग’ इक्ट्ठे हो जाते हैं । इस तरह से लोग धीरे -धीरे आगे रामलीला स्थान की तरफ ‘सेलवालों’ की पौरी से होते हुए चलते हैं । यहाँ से रास्ता थोड़ा सँकरा है इसलिए DJ वाली गाड़ी को निचले परिक्रमा मार्ग से निकालते हैं ।
इसके बाद फेरी का प्रवेश फिर से 10 विसे में होता है और रामलीला में मैदान पर आकर इस रंगवाली होली का समापन क़रते हैं । सब लोग अपने-अपने घरों को चले जाते हैं और नहा-धोकर दोपहर से लगने वाले मेले की तैयारी करते हैं । सब के यहाँ पर 12 बजे के बाद रिश्तेदार आने लगते हैं । चारों तरफ खुशियों का नजारा होता है ।
शाम को करीब 3 बजे से ‘ भरनाकलां काली कमेटी’ की तरफ से ‘काली’, पट्टेबाजी, घायल प्रदर्शनी व अलग-अलग अनौखी झाकियां निकाली जाती है । सुबह वाली ‘होली की फेरी’ की तरह ही "काली के खेल को" पूरे गांव में होकर निकालते हैं । 6:30 बजे शाम तक इसका समापन उसी रामलीला स्थान पर आकर हो जाता है । फिर से सब अपने -अपने घर चले जाते हैं और अतिथियों की आवभगत करते हैं । पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं का भी बराबर योगदान इस दिन रहता है । वह सुबह से आने वाले सगे संबंधियों के लिए व्यंजनों की व्यवस्था करती हैं । इसके बाद करीब 11 बजे से रात को लोकनृत्य, नौटंकी, रसिया दंगल आदि का प्रोग्राम सुबह 4 बजे तक होता है ।🌻
इस तरह से हर साल यही परंपरा सदियों से चली आ रही है । इसी तरह से स्वसमाज के ब्रजमंडल में स्थित अन्य गांवों में भी क्रमवार होली के मेलों का आयोजन होता है । होली के इन्हीं मेलों के आधार पर आपस मिलने के बहाने 'घर छोड़कर रह रहे शहरों में रहने वाले अपनी समाज के लोग' प्रतिवर्ष मथुरा, नोएडा, ग्वालियर इत्यादि जगहों पर ‘होली मिलन’ का समारोह क़रते हैं ।
Bharanakalan video map on Google Earth
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
गांव भरनाकलां की सामाजिक संपत्ति एवं संचालक समितियां -
1- बाँकेविहारी मन्दिर [सम्पूर्ण गांव]
2- राधा-कृष्ण (छोटा) मंदिर [सवा विशा]
3- रामलीला कमेटी [दश विशा]
4- बारातघर(प्याऊ) [दश विशा]
5- काली कमेटी [दश विशा]
6- होली मेला कार्यक्रम [ तीनों थोकों द्वारा (सवा विशा, ढाई विशा, दश विशा ! एक-एक वर्ष के लिए)
*****************************************
Notable Persons of Bharanakaln-
1- केप्टन राकेश शर्मा (शौर्य चक्र)
ग्राम भरनाकलाँ के प्रधानों का विवरण
11 वे स्थान पर गणपति और 12वां 2020- ?
गांवप्रधानी थोकानुसार-
10 विशा- 5 बार
2.5 विशा- 3
1.25 विशा- 2
नगला- 1
63 Saal ki pradhani--- Bharanakalan
10+7+6+5+5 =33 saal (10 vissa)
5+5+5+5 =20 saal (Dhai vissa)
5 =5. Saal. (Sawaa vissa)
5. =5. saal. (Naglaa)
******************************************
हर गाँव 20 विसे का होता है लेकिन हमारा गांव 10 विसा+1.25विसा+2.5विसा+5 विसा(डिरावली:भरनाकलां से निकला गांव), 1.25 विसा नहर पार नगला ।
स्कूल/कॉलेज- सरस्वती शिशु मंदिर, प्राइमरी विद्यालय, कैप्टन राकेश इंटर कॉलेज
बैंक- सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया
हॉस्पिटल-गवरमेंट अस्पताल
मंदिर- बाँके बिहारी मंदिर, राधाकृष्ण मंदिर
साप्ताहिक बाजार-शनि बाजार
भरनाकलां का मानचित्र: Map of Bharanakalan Village
पुराणों के अनुसार यक्षों का कार्य पापियों को विघ्न करना, उन्हें दुर्गति देना और साथ ही साथ अपने क्षेत्र का संरक्षण करना था। मथुरा संग्रहालय में इस प्रकार के यक्ष और यक्षणियों की छह प्रतिमाएं हैं, जिनमें "भरनाकलां से प्राप्त मूर्ति " भी शामिल है |यक्ष का पूजन उस समय बड़ा ही लोकप्रिय था।
भरनाकलां होली मेला दृश्य
विश्व के अन्य सभी देशों की तुलना में “भारत” वास्तव में आज भी गांवों का ही देश है। कला, संस्कृति, वेशभूषा के आधार पर आज भी ‘गांव’ देश की रीढ़ की हड्डी बने हुये हैं। प्रत्येक गांव का एक अपना ही महत्व होता है जिसका पता वहां रहने वाला ही जानता है।
गांव भरनाकलां भी भारत के लाखों गांवों जैसा ही है । लगभग साढ़े चार सौ घरों की इस बस्ती का गांव है भरनाकलां ! भरनाकलां गांव छाता-गोवर्धन रोड पर स्थित है । गांव के पूर्व में भरनाखुर्द, पश्चिम में ततारपुर, उत्तर में सहार, दक्षिण में पाली गांव स्थित है ।
गांव के तीनौं तरफ प्रमुख तालाब हैं इसके पूर्व में श्यामकुण्ड, पश्चिम में नधा, दक्षिण में मुहारी(मुहारवन) एवं उत्तर में समोंखरी(छोटा तालाब) है ।
गांव में बारात के ठहरने के लिए बारात घर की भी व्यवस्था है । गांव में खाद गोदाम भी है । पीने के स्वच्छ जल की व्यवस्था गांववासियों ने बिना सरकार की सहायता लिए बगैर,स्वयं यहाँ के लोगों व्यवस्थित की गई है । यहां के लोग हर क्षेत्र में कार्य करने में सक्षम होते जा रहे हैं।
अगर हम गांव की आबादी स्वसमाज के अनुसार देखते हैं तो करीब 50 प्रतिशत से ज्यादा की भागेदारी है और अपने समाज के गोत्र के हिसाब से यहाँ, नुक़्ते/वर्गला, ईटोंइयाँ, कुम्हेरिया, पचौरी, भुर्र्क, तगारे, परसैया आदि परिवार निवास करते हैं । गाँव के उत्तर में कलकल करती हुई आगरा नहर बहती है । चारों और खेतों की हरियाली गाँव की शोभा बढ़ाती है । पूर्व और दक्षिण में भरतपुर फीडर(बम्बा)और पश्चिम में खार्ज बम्बा कृषि सिंचाई की पूर्ति करता है। गाँव से थोड़ी दूरी पर एक बड़ा सा बाँकेबिहारी जी का मंदिर है जिसके पास मुहारवन तालाब है । पाठशाला और अस्पताल गाँव के बाहर है ।
गाँव के सभी वर्णों के लोग यहाँ रहते हैं । गाँव में अधिकतर किसान रहते है । गाँव में गेंहू, चना, मक्का, ज्वार, चावल, सरसों एवं गन्ने की उपज होती है । कुछ लोग भांग, तंबाखू का सेवन भी करते हैं अन्य जगहों की तुलना करने पर फिर भी मेरा गाँव अपने आप में अच्छा हैं । यहाँ प्रकर्ति की शोभा है, स्नेहभरे लोग हैं, धर्म की भावना है और मनुष्यता का प्रकाश है । रोजगार की वजह से दिल्ली की तरफ लोगों का पलायन बड़ी मात्रा में हो रहा है ।
हमारे गांव के पास से जो आगरा नहर बह रही है वह नहर नहीं उसे ‘जीवन की धारा’ कहिए, क्योंकि वह जहाँ-जहाँ भी वह पहुंची है, सूखे खेतों में नया जीवन लहलहा उठा है। बंजर भूमि भी सोना उगलने लगी है। जब हम घर-द्वार से दूर किसी नगर में या वहां से भी दूर परदेश में होते हैं तो भी अपना गांव स्वप्न बनकर हमारे ह्रदय में समाया रहता है, रह-रहकर उसका स्मरण तन मन में उत्तेजना भरता रहता है।
यहाँ की दो-तिहाई से अधिक जनसंख्या गांव में रहती है । आधे से अधिक लोगों का जीवन खेती पर निर्भर है इसलिए ‘गांवों के विकास’ के बिना देश का विकास किया जा सकता है, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता । गाँव के अंदर ही बैंक, एटीएम व डाकघर स्थित है । यहाँ पक्की सड़कें एवं बिजली की उत्तम उचित व्यवस्था है ।
होली, दीवाली, रक्षाबंधन, दशहरा , शरद पूर्णिमा बडे धूमधाम से मनाये जाते हैं विशेषकर होली का त्यौहार बड़े ही हर्ष-उल्लास के साथ सब ग्रामवासी मिलकर मनाते हैं । रंगवाली होली जिसे धुलैंडी बोलते हैं उसी दिन गाँव का मेला होता है । मेले वाले दिन सभी नाते- रिश्तेदार अपने-अपने रिश्तेदारों के यहाँ आते हैं । उस दिन गांव में दिन निकलते ही होली का खेल शुरू हो जाता है । सब लोग हाथों में रंग, गुलाल लिए घरों से बाहर निकल कर सभी लोगों को रंग लगाते हैं और DJ और बाजे के साथ गांव की पूरी परिक्रमा करते हैं । ये एक जुलूस की तरह होता है । ये जुलूस होली के उत्सव में चार चांद लगा देता है । यह एकता का प्रतीक है । इसमें सभी धर्म-जाति के लोग होते हैं ।
🌻क्षेत्रफल के हिसाब से वैसे गांव ‘तीन थोक’ में बँटा हुआ है, मेले की फेरी की शुरुआत 10 विसा के "रामलीला स्थान" से होती है । इसके बाद फेरी ‘पौठा चौक’ से होते हुए ‘कुम्हरघड़ा हवा’ की ओर बढ़ती है । इसके बाद 2.5 विसा की तरफ बढ़ते हैं जो कि ‘ईटोइयाँ परिवारों’ को रंग लगाते हुए आगे बढ़ते हुए शोभाराम प्रधान जी के घर के सामने लोग भांग का भोग लेते हैं ।
विश्राम लेने के बाद आगे बढ़ते हुए ‘कुम्हेरिया परिवारों’ की तरफ होते हुए 1.25 विसा में प्रवेश करते हैं, यहीं एक छोटा सा मंदिर भी है, सब लोग ठाकुर जी को रंग लगाते हैं । यहाँ आकर सारे ग्रामवासी ‘तीनों थोकौं के लोग’ इक्ट्ठे हो जाते हैं । इस तरह से लोग धीरे -धीरे आगे रामलीला स्थान की तरफ ‘सेलवालों’ की पौरी से होते हुए चलते हैं । यहाँ से रास्ता थोड़ा सँकरा है इसलिए DJ वाली गाड़ी को निचले परिक्रमा मार्ग से निकालते हैं ।
इसके बाद फेरी का प्रवेश फिर से 10 विसे में होता है और रामलीला में मैदान पर आकर इस रंगवाली होली का समापन क़रते हैं । सब लोग अपने-अपने घरों को चले जाते हैं और नहा-धोकर दोपहर से लगने वाले मेले की तैयारी करते हैं । सब के यहाँ पर 12 बजे के बाद रिश्तेदार आने लगते हैं । चारों तरफ खुशियों का नजारा होता है ।
शाम को करीब 3 बजे से ‘ भरनाकलां काली कमेटी’ की तरफ से ‘काली’, पट्टेबाजी, घायल प्रदर्शनी व अलग-अलग अनौखी झाकियां निकाली जाती है । सुबह वाली ‘होली की फेरी’ की तरह ही "काली के खेल को" पूरे गांव में होकर निकालते हैं । 6:30 बजे शाम तक इसका समापन उसी रामलीला स्थान पर आकर हो जाता है । फिर से सब अपने -अपने घर चले जाते हैं और अतिथियों की आवभगत करते हैं । पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं का भी बराबर योगदान इस दिन रहता है । वह सुबह से आने वाले सगे संबंधियों के लिए व्यंजनों की व्यवस्था करती हैं । इसके बाद करीब 11 बजे से रात को लोकनृत्य, नौटंकी, रसिया दंगल आदि का प्रोग्राम सुबह 4 बजे तक होता है ।🌻
इस तरह से हर साल यही परंपरा सदियों से चली आ रही है । इसी तरह से स्वसमाज के ब्रजमंडल में स्थित अन्य गांवों में भी क्रमवार होली के मेलों का आयोजन होता है । होली के इन्हीं मेलों के आधार पर आपस मिलने के बहाने 'घर छोड़कर रह रहे शहरों में रहने वाले अपनी समाज के लोग' प्रतिवर्ष मथुरा, नोएडा, ग्वालियर इत्यादि जगहों पर ‘होली मिलन’ का समारोह क़रते हैं ।
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🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
गांव भरनाकलां की सामाजिक संपत्ति एवं संचालक समितियां -
1- बाँकेविहारी मन्दिर [सम्पूर्ण गांव]
2- राधा-कृष्ण (छोटा) मंदिर [सवा विशा]
3- रामलीला कमेटी [दश विशा]
4- बारातघर(प्याऊ) [दश विशा]
5- काली कमेटी [दश विशा]
6- होली मेला कार्यक्रम [ तीनों थोकों द्वारा (सवा विशा, ढाई विशा, दश विशा ! एक-एक वर्ष के लिए)
*****************************************
Notable Persons of Bharanakaln-
1- केप्टन राकेश शर्मा (शौर्य चक्र)
ग्राम भरनाकलाँ के प्रधानों का विवरण
11 वे स्थान पर गणपति और 12वां 2020- ?
गांवप्रधानी थोकानुसार-
10 विशा- 5 बार
2.5 विशा- 3
1.25 विशा- 2
नगला- 1
63 Saal ki pradhani--- Bharanakalan
10+7+6+5+5 =33 saal (10 vissa)
5+5+5+5 =20 saal (Dhai vissa)
5 =5. Saal. (Sawaa vissa)
5. =5. saal. (Naglaa)
******************************************
हर गाँव 20 विसे का होता है लेकिन हमारा गांव 10 विसा+1.25विसा+2.5विसा+5 विसा(डिरावली:भरनाकलां से निकला गांव), 1.25 विसा नहर पार नगला ।
गाँव भरनाकलां तीन थोकों (सेक्टर्स) में बँटा हुआ है जिसके अंतर्गत *"10 विसा", "2.5 विसा", "1.25 विसा"* आते हैं । भरनाकलां में रह रहे स्वसमाज के 13 में से *11 उपगोत्रों* के लोग अकेले "10 विसे" में हैं । 2.5 विसे में *3* व 1.25 विसे में *2 उपगोत्रों* के लोग निवास करते हैं ।
उपगोत्रों के नाम इस प्रकार से हैं-
1-नुक़्ते(बरगला) 2- इटोइयाँ 3-कुम्हेरिया 4-तगारे 5- भुर्रक 6-सिकरोरिया 7-परसईंयां 8-बजरावत 9- रमैया 10-दीगिया 11-कांकर 12- पचौरी 13- प्रधान(पधान) 14- नायकवार
_____________________________________________
: पं. ओमन सौभरि भुर्रक (भरनाकलां)
उपगोत्रों के नाम इस प्रकार से हैं-
1-नुक़्ते(बरगला) 2- इटोइयाँ 3-कुम्हेरिया 4-तगारे 5- भुर्रक 6-सिकरोरिया 7-परसईंयां 8-बजरावत 9- रमैया 10-दीगिया 11-कांकर 12- पचौरी 13- प्रधान(पधान) 14- नायकवार
_____________________________________________
: पं. ओमन सौभरि भुर्रक (भरनाकलां)
(गैया बाबा परिवार)
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ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा
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ब्रजराज बलदाऊ मन्दिर के संस्थापक श्री कल्याणदेवचार्य
माँ सती हरदेवी पलसों
श्री बलदाऊ जी मन्दिर, बल्देव, मथुरा
सौभरि ब्राह्मण समाज के गोत्र, उपगोत्र व गांवों के नाम के बारे में जानिए ।
माँ सती हरदेवी पलसों
श्री बलदाऊ जी मन्दिर, बल्देव, मथुरा
सौभरि ब्राह्मण समाज के गोत्र, उपगोत्र व गांवों के नाम के बारे में जानिए ।
ब्रजभूमि का सबसे बड़ा वन महर्षि 'सौभरि वन'
आऔ ब्रज, ब्रजभाषा, ब्रज की संस्कृति कू बचामें
ब्रजभाषा लोकगीत व चुटकुले, ठट्ठे - हांसी
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