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Tuesday, August 19, 2025

ऐसा कहा जाता है कि गांव भरनाकलां में ब्रह्मर्षि सौभरि अहिवासी वंशजों के गांव में आने से पहले कलार जाति रहती थी।

 गांव भरनाकलां में सौभरि वंशजों (आदिगौड़ अहिवासी ब्राह्मणों) से पहले कलार नामक जाति रहती थी, ऐसा गांव के ही लोग कहते हैं। तत्कालीन गांव, वर्तमान में स्थित श्मशान भूमि के आसपास था, वहां आज भी बहुत बड़ा कुआं है जो कि प्रयोग में नहीं है। हालांकि आज भरनाकलां गांव एक विशेष टीले पर बसा हुआ है जिसकी जनसंख्या ४५०० के आसपास है और १८ वर्ष अथवा इससे अधिक आयु के लोगों की संख्या लगभग २५०० के आसपास है। कलार जाति के बाद भरनाकलां में स्वसमाज (अहिवासी ब्राह्मण) की बसावट ४ भाइयों की देन है जो कि स्वसमाज के बरगला उपगोत्र से संबंध रखते थे वर्तमान में उन्हीं के वंशज आज भरनाकलां में लगभग ५० % के आसपास हैं ( अगर केवल स्वसमाज के अनुपात को देखा जाए तो) । गांव भरनाकलां के पड़ोस में एक गांव है डिरावली जो कभी गांव भरनाकलां के क्षेत्रफल में से ही निष्कासित हुई भूमि है । गांव भरनाकलां के क्षेत्रफल में से २५% हिस्सा उस गांव के खाते में है। ऐसा इसलिए हुआ कि जो चार भाई थे (बरगला उपगोत्री/अवंटक) उनमें से एक भाई ने अपना विवाह ठाकुर जाति की लड़की से कर लिया था, पहले अंतर्जातीय विवाह करने पर बहिष्कार (छेक) कर ने की रीति अथवा कुरीति थी। ऐसा होने पर चौथे भाई ने अपने हिस्से की भूमि, लगभग २५% हिस्से को अलग कर नया गांव डिरावली बसा दिया । फ़िर कुछ समय व्यतीत होने पर आना- जाना शुरू हो गया, लगभग गांव डिरावली और भरनाकलां का आपसी सद्भाव १९८० ईस्वी के आसपास तक रहा जिसमें गांव के कार्यक्रम में एक दूसरे गांव के लोगों का आना जाना जारी रहा।वर्तमान में ऐसा रिवाज नहीं है ।

👉आप जानना चाहते हैं कौन है कलार जाति- 

कलार जाति, जिसे कलवार, कलाल भी कहा जाता है । यह भारत में पाई जाने वाली एक जाति है जिसका इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा है। पारंपरिक रूप से यह जाति शराब बनाने और बेचने के व्यवसाय से जुड़ी रही है । कलार जाति का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों, जैसे रामायण, महाभारत, और पुराणों में भी मिलता है, जहां उन्हें शौंडिक (शराब बनाने वाला) के रूप में संदर्भित किया गया है । वे ताड़ी, शराब और अन्य मादक पेय पदार्थों के उत्पादन और बिक्री में शामिल थे। शराब बनाने और बेचने के व्यवसाय के कारण कलार जाति को भारत में अन्य जातियों द्वारा निम्न माना जाता था । ये जाति ऐतिहासिक रूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तर एवं मध्य भारत के अन्य भागों में पाई जाती है। 

संस्कृत व्युत्पत्ति से कलवार शब्द का भी अपना एक स्वतंत्र अर्थ है । “यथा कलः सुन्दरः वारयस्य ” जिनके दिन वाणिज्य व्यवहारादि द्वारा सुखमय रहते हों, वे कलवार कहलाए । कलाल समाज के लोग भगवान विष्णु के राम और कृष्ण अवतारों को भी पूजते हैं । कुछ कलाल समाज के लोग, विशेष रूप से क्षत्रिय कलाल, अपनी कुलदेवी के रूप में मां दुर्गा या कालका माता को भी मानते हैं । कुछ कलाल समाज के लोग, विशेष रूप से जैन पंथ के, जैन धर्म को भी मानते हैं ।

कलार जाति को भारत में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है ।  कुछ राज्यों में, कलार जाति को ओबीसी की सूची में शामिल किया गया है. उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में, कलार जाति को कलवार और कलाल के साथ ओबीसी की केंद्रीय सूची में शामिल किया गया है, National Commission for Backward Classes (NCBC). इसी तरह, पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग ने 2013 में कलाल/इराक़ी वर्ग को पश्चिम बंगाल राज्य की अन्य पिछड़ा वर्गों (OBC) की सूची में शामिल करने की सिफारिश की थी ।

 कलवार जाति का इतिहास काफी प्राचीन है और इसे हैहयवंशी क्षत्रियों से भी जोड़ा जाता है । कुछ विद्वानों का मानना है कि कलवार पहले क्षत्रिय योद्धा थे जो सेना के पिछले हिस्से में रहकर "कल्यवर्त्त" या "कलेउ" की रक्षा करते थे, और बाद में शराब बनाने के व्यवसाय में लग गए । हालांकि, यह भी कहा जाता है कि कलवारों में 40 से अधिक उपजातियाँ हैं, और यह व्यवसाय कई जातियों के लोगों द्वारा अपनाया गया था । कुछ लोग कलवार जाति को वैश्य वर्ण के अंतर्गत मानते हैं । कलवार जाति के कुछ उप-समूहों में जायसवाल, गुप्त, और हैहय क्षत्रिय शामिल हैं ।

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✍️👉 दूसरी कलाल जाति इराक़ी वर्ग से ताल्लुक रखती है जो मूल रूप से सेंट्रल बिहार से है जो वर्षों पहले पलायन करके पश्चिम बंगाल आया और यहां विभिन्न स्थानों पर रहने लगा।

– इनकी मुख्य भाषा उर्दू है लेकिन ये बंगला, हिन्दी और भोजपुरी भी बोलते हैं।

– कलाल/इराक़ी सुन्नी मुसलमान हैं।

– इनके पूवर्ज हिन्दू ‘कलवार’ थे जिन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया था।

– हिन्दुओं की ‘कलवार’ जाति की तरह कलाल/इराकी भी अलग-अलग सरनेम का इस्तेमाल करते हैं।